चश्म बंदों गोशबन्दों लब बंदोगर न बिनी सिर्रेबर मन बखंदयह पंक्ति दरअसल कबीर या किसी सूफ़ी/भक्ति संत की रचना हो सकती है जिसमें मन और इंद्रिय (आंख, कान, होंठ आदि) को बंद करने का अर्थ आंतरिक शांति और एकाग्रता से जोड़ा गया है।”चश्म बंदों” का मतलब है आंखें बंद करना, “गोशबन्दों” का मतलब है कान बंद करना, “लब बन्धों” का मतलब है जबड़े या होंठ बंद करना, और “गर न बिनी सिर्रेबर मन बखंद” का अभिप्राय है कि सिर (शरीर) का ध्यान मन से न बँधा हो। यानि भौतिक इंद्रियों को बंद कर भी अगर मन शांत और एकाग्र नहीं है, तो साधना पूरी नहीं होती।इसका सादृश्य यह है कि सिर्फ बाहरी इंद्रियों को बंद कर लेना पर्याप्त नहीं है, मन का नियंत्रण और उसके स्थिर होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। मन बँधना यानी मन का नियंत्रण और उसकी एकाग्रता, जो भीतर की शांति से जुड़ी हो, वह योग और ध्यान की मूलभूत आवश्यकता है।यह पंक्ति साधना के इस महत्वपूर्ण बिन्दु पर प्रकाश डालती है कि केवल बाहरी इंद्रियों को संयमित कर लेना या बंद कर लेना ही नहीं, बल्कि मन को भी उसी तरह संयमित करना और केन्द्रित करना आवश्यक है ताकि वास्तव में आंतरिक शांति और ध्यान की प्राप्ति हो सके। यह आध्यात्मिक अभ्यास में जरूरी है।अत: यह वाक्यांश गुरु और योग की दृष्टि से बताता है कि मन का बँधना (एकाग्र होना) इंद्रिय संयम से भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, बिना मन के बँधे साधना अधूरी रहती है। यह कई तत्वज्ञ संतों और कवियों के अनुसार योग और भक्ति में महत्वपूर्ण तत्व है

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