अव्यक्तं व्यक्तमापन्नं मन्यन्ते मामअभुद्दयः ।परं भावमजानन्तो मम सर्वं यथा भवति तत् ॥ २४ ॥भगवान कहते हैं – अज्ञानी मुझे अव्यक्त (निर्गुण) से व्यक्त (सगुण) रूप धारण करने वाला मानते हैं, किंतु मेरा परम स्वरूप अजन्मा और सर्वव्यापी है। मैं सबके हृदय में ज्ञानस्वरूप स्थित हूँ।कुंडलिनी जोड़: यह श्लोक कुंडलिनी जागरण से जुड़ता है – अव्यक्त (मूलाधार में निद्रा चेतना) व्यक्त (सहस्रार में जागृत) रूप लेती है। योगियों के EEG अध्ययनों में theta waves इस “परं भाव” की अनुभूति दर्शाते हैं।सूफी समानता: रूमी कहते हैं, “तू छिपा है हर रूप में” – बाहरी अवतार (फना फिल्लाह) से परे हक़ीक़त। चिश्ती सिलसिले में मुर्शिद का नूर इसी सर्वज्ञता का प्रतीक।श्लोक 27-30: माया और विजयी भक्तमाया (इच्छा-राग) से जीव मोहित होता है, किंतु मेरी भक्ति से पारंगत भक्त मायावी रहस्यों को जान लेते हैं। वे अधिभूत (स्थूल), अधिदैव (सूक्ष्म), अधियज्ञ (हृदय) रूप में मुझमें स्थित होते हैं।जीवन अनुप्रयोग: आधुनिक तनाव (माया के जाल) में यह भक्ति मन को केंद्रित रखती है – जैसे कार्य में “अधियज्ञ” भाव से कर्मयोग।कुंडलिनी-सूफी संगम: कुंडलिनी चढ़ाई सूफी “तसव्वुर-ए-नूर” जैसी – दोनों में अनाहद नाद (ओम/हू) सुनाई देता है। कबीर दोहा: “ओम हूँ सबमें व्याप्त” – गीता का जीवंत रूप।अध्याय संकलन: समर्पण का मार्गअध्याय 7 पूर्ण भक्ति सिखाता है – इच्छा से समर्पण तक। विवेकानंद जी इसे कर्मयोग कहते हैं, जहाँ ज्ञानी “वासुदेवः सर्वमिति” जीता है।आज का अभ्यास:प्रातः श्लोक 24-30 जपें।कुंडलिनी ध्यान: मूलाधार से सहस्रार नूर कल्पना।सूफी भाव: “हूँ सबमें” का चिंतन, 10 मिनट मौन।