विवेक वेदांत दर्शन में आत्मा-अनात्मा, सत्य-असत्य या नित्य-अनित्य के भेद की बुद्धि है। यह साधना चतुष्टय का प्रथम अंग है, जो संसार की मिथ्या प्रकृति को पहचानाता है।विवेक की परिभाषाआदि शंकराचार्य के अनुसार, विवेक नित्य (ब्रह्म, आत्मा) और अनित्य (शरीर, इंद्रिय जगत) में भेद करने की क्षमता है। यह भ्रम से सत्य को अलग करता है, जैसे रस्सी को साँप समझने का भ्रम दूर करना। वास्तविक विवेक मनातीत सत्य को मानसिक कल्पना से पृथक करता है।विवेक का स्वरूपविवेक शाब्दिक रूप से ‘विच’ धातु से भेद-निर्णय है, जो सच्चा ज्ञान उत्पन्न करता है। यह धर्म-अधर्म से परे जाकर ब्रह्म को जानने की शक्ति है आत्मज्ञान के लिए विवेक वैराग्य का आधार बनता है।, आत्मा की पहचान से मुक्ति संभव है, जैसा कि वेदांत और भगवद्गीता में वर्णित है। विवेक, समर्पण और नियमित साधना इसके प्रमुख साधन हैं, जबकि “अहं ब्रह्मास्मि” महावाक्य इसकी मूल कुंजी है।आत्मज्ञान का महत्वआत्मा को जानना ही मोक्ष का मार्ग है, क्योंकि यह जीवात्मा और परमात्मा के एकत्व का बोध कराता है। उपनिषदों में “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ) बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया महावाक्य है, जो अद्वैत वेदांत का आधार है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मज्ञान से बंधनों से मुक्ति मिलती हैआवश्यक साधनविवेक संसार की नश्वरता समझने में सहायक है, समर्पण भक्ति योग का रूप है, और नियमित साधना (समय्यक) ध्यान व चिंतन से आत्मा का साक्षात्कार कराती है। ज्ञान योग में विवेक-वैराग्य प्रधान है, जबकि भक्ति में समर्पण। ये गीता के चार योगों (ज्ञान, भक्ति, कर्म, ध्यान) से जुड़े हैं।वेद-गीता का ज्ञानवेदों के उपनिषद “अहं ब्रह्मास्मि” से आत्मा-ब्रह्म अभेद बताते हैं, पर गीता में भगवान को जानने पर मुक्ति का वर्णन है। कठोपनिषद कहता है, “यं ज्ञात्वा मुच्यते” अर्थात् भगवान को जानकर मुक्ति। यह ज्ञान गुरु के मार्गदर्शन से ही प्राप्त होता है।विवेक से आत्मज्ञान प्राप्ति एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जो वेदांत और योग शास्त्रों में वर्णित है। यह आत्मा-अनात्मा के भेद को स्पष्ट कर मुक्ति की ओर ले जाती है।विवेक के प्रारंभिक चरणसबसे पहले श्रवण करें—शास्त्रों और गुरु वचनों से ज्ञान ग्रहण करें। फिर मनन करें, अर्थात् सुने हुए को बुद्धि से विचार करें, जैसे शरीर नश्वर है पर आत्मा अमर। इसके बाद विवेक जागृत होता है, जो संसार की मिथ्या को पहचानाता है।अभ्यास और वैराग्यनियमित चिंतन से वैराग्य विकसित करें—इंद्रिय सुखों से विरक्ति। ध्यान में “अहम् ब्रह्मास्मि” का जाप करें, जिससे क्लेश क्षय होते हैं और चित्त शुद्ध होता है। सात लक्षण प्रकट होते हैं: क्लेश नाश, कर्म संचय समाप्ति, आत्मा-प्रकृति भेद बोध।समाधि की प्राप्तिनिरंतर अभ्यास से विवेक-ख्याति स्थायी हो जाती है, जिससे केवल्य (मुक्ति) मिलती है। परम शांति और आत्मप्रकाश में स्थिर रहें। गीता के ज्ञान योग में यही विवेक का मार्ग है