हकीकत का सचखंड आध्यात्मिक परंपराओं में सत्य का शुद्ध क्षेत्र या परम सत्य की अवस्था को कहते हैं, जहां आत्मा माया और संसारिक बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा में एकाकार हो जाती है। इसका महत्व मोक्ष, शाश्वत शांति और दिव्य आनंद की प्राप्ति में है, जो भक्ति, नाम जप और गुरु मार्गदर्शन से संभव होता है ।अर्थसचखंड का शाब्दिक अर्थ ‘सच’ (सत्य) और ‘खंड’ (क्षेत्र या स्थान) से मिलकर बना है, जो सिख धर्म, राधास्वामी मत और सनातन परंपराओं में परमात्मा के निवास या तुरीय अवस्था को दर्शाता है। यह वह दिव्य लोक है जहां निरंकार ईश्वर वास करते हैं और जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है । अद्वैत वेदांत में इसे ब्रह्मलोक या सतलोक के समान माना जाता है, जहां अहंकार और पंचविकार नष्ट हो जाते हैं।महत्वसचखंड की प्राप्ति जीवन का परम लक्ष्य है, जो निस्वार्थ भक्ति, सत्संग और सत्य आचरण से होती है, फलस्वरूप आत्मा को अनंत आनंद और सर्वव्यापकता का अनुभव होता है। यह अवस्था माया से परे होने से सभी दुखों का अंत करती है और जीव को ईश्वर के साथ स्थायी मिलन प्रदान करती है । गुरु ग्रंथ साहिब में इसका उल्लेख मोक्ष के प्रतीक के रूप में है, जो भक्त को शाश्वत शांति देता है।प्राप्ति का मार्गनाम सिमरण, गुरु शिक्षाओं का पालन और सेवा से सचखंड तक पहुंचा जा सकता है, जैसा गुरु नानक देव ने वर्णित किया। कुंडलिनी जागरण या भक्ति योग में यह अनाहद नाद के माध्यम से अनुभूत होता है, जो उपयोगकर्ता की रुचि के अनुरूप हैआध्यात्मिक दुनिया में हकीकत का सचखंड परम सत्य ब्रह्म या परमात्मा ही है, जो माया के भ्रम से परे शाश्वत वास्तविकता है। परमात्मा का प्रेम निस्वार्थ भक्ति का आधार बनता है, जो जीव को इस सचखंड तक ले जाता है।हकीकत का सचखंडआध्यात्मिक जगत में हकीकत का सचखंड उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म है, जो एकमात्र सत्य है और जगत मिथ्या या माया। अद्वैत वेदांत में यह तुरीय अवस्था के रूप में वर्णित है, जहां अज्ञान का नाश होकर आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है । यह सत्य ध्यान और ज्ञानयोग से अनुभव किया जाता है, न कि इंद्रियों से।परमात्मा का प्रेमपरमात्मा का प्रेम भक्ति का दिव्य साधन है, जो सच्चे भक्त के हृदय को सभी प्राणियों के प्रति विस्तारित कर देता है। यह प्रेम साधना से प्राप्त होता है और जीव को संसार के दुखों से मुक्त कर परम सत्य तक पहुंचाता है भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा प्रेमी भक्त उन्हें सबसे प्रिय है।एकीकरण का मार्गसचखंड की प्राप्ति के लिए प्रेम और ज्ञान का समन्वय आवश्यक है; प्रेम हृदय को शुद्ध करता है, जबकि ज्ञान माया का पर्दा हटाता है। गुरु-शिष्य परंपरा में यह अनुभव सत्संग और जप से फलित होता है कुंडलिनी योग में भी यह प्रेम अनाहद नाद के रूप में प्रकट होता है।