सूफी दर्शन और भक्ति परंपरा में इश्क (दिव्य प्रेम) ही इंसान को खुदा तक पहुँचाने का सबसे शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। यह प्रेम नफ्स (अहंकार) को नष्ट कर फना की अवस्था देता है, जहाँ जीव और ईश्वर का मिलन होता है।सूफी मत में इश्कसूफी संत जैसे रूमी और बुल्ले शाह कहते हैं कि सच्चा इश्क खुदा का इश्क है, जो संसारिक मोह को जला देता है। इश्क के वेग से माया टूटती है और प्रेमी परम धाम पहुँचता है।भक्ति-अद्वैत समानताभगवद्गीता और उपनिषदों में भी प्रेम (भक्ति) ही मोक्ष का द्वार है। कबीर के शब्दों में, “प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय”—इश्क से ही अद्वैत सिद्ध। ध्यान साधना में यह कुंडलिनी जागरण का रूप लेता है।साधना मार्गइश्क को जगाने हेतु गुरु कृपा और नाम जप आवश्यक।नफ्स की जीत से तुर्या अवस्था प्राप्ति।रूहानी इश्क में दूरी का भेद मिट जाता है।