मेरे आईने ने मुझे देखा और कहा,जब शून्य में साधक खो, खुद शून्य हो जाता है,तो महाशून्य में अपना अस्तित्व खोकर,जब खुद की तलाश करता है,तो उसे महाशून्य में परमात्मा रूपी गुरु ही खड़े नजर आते हैं,खुद का अस्तित्व गुरु में मिल चुका होता है।शून्य से उठे तरंग, मन का मल धो डारें,गुरु की कृपा बरसे, अहंकार का घर झारें।महाशून्य में खड़े वे, सत्य का दीप जलाएं,साधक का स्वरूप वे ही, ब्रह्म का रूप धराएं।कबीर कहें सुनो रे मनवा, गुरु ही तो परम सारा,शिष्य खोकर पावे मोहि, यहि मार्ग निरभारा।यह विस्तार मूल भाव को बनाए रखते हुए साधना के चरणों को जोड़ता है—शून्यता, विलय, और गुरु-बोध। इसे ध्यान या भजन में जप सकते हैं।शास्त्रीय संदर्भयह श्लोक अद्वैत वेदांत, भक्ति और सूफी परंपराओं से प्रेरित है। प्रमुख ग्रंथों से जुड़ाव:मांडूक्य उपनिषद (तुरीय अवस्था): शून्य → महाशून्य तुरीय है, जहाँ “न जाग्रत् न स्वप्न न सुप्ति… न नामरूपे”। साधक अहंकार खोकर ‘ओम’ में लीन होता है। आपका श्लोक यही कहता है—महाशून्य में गुरु ही ‘सत्-चित्-आनंद’ रूप दिखते हैं।भगवद्गीता (अध्याय 6, श्लोक 20-27): श्रीकृष्ण योगी की समाधि वर्णन करते हैं: “यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया”। शून्य में मन स्थिर हो, महाशून्य में परमात्मा (गुरु) प्रकट। अर्जुन को कृष्ण ही गुरु बने, जैसे आपका आईना साधक को दिखाता है।कबीर ग्रंथावली: “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।” गुरु ही परमात्मा; शिष्य का अस्तित्व उनमें विलीन। आपका श्लोक इसका प्रतिबिंब है।रामचरितमानस (बालकांड, गुरु-शिष्य): तुलसीदास जी कहते हैं, “गुरु बिनु ज्ञान न होय।” शून्य साधना से गुरु-मिलन होता है, जैसे शिव को विश्वामित्र ने दीक्षित किया।सूफी संदर्भ (फना की अवस्था): रूमी कहते हैं, “खुद को खो दो, तो ईश्वर मिलेगा।” महाशून्य में ‘बाक़ा’ (गुरु रूपी परमात्मा) दिखता है—भारतीय भक्ति से समानता।आध्यात्मिक व्याख्या: चरणबद्ध यात्रासाधना को तीन चरणों में समझें:शून्य में प्रवेश: प्राणायाम/ध्यान से मन शांत। कुंडलिनी जागरण में सहस्रार पर पहुँचकर ‘अनाहद नाद’ सुनाई देता। अहंकार ‘शून्य’ हो जाता।महाशून्य का अनुभव: तुरीय अवस्था। ‘नेति नेति’ से आगे, द्वैत मिटता है। यहाँ गुरु (परमात्मा) ही ‘खड़े नजर आते हैं’—जैसे रामाना महर्षि के सत्संग में ‘मैं कौन?’ का उत्तर गुरु-आत्मा ही देता।विलय और बोध: अस्तित्व गुरु में मिला। “अहं ब्रह्मास्मि” (बृहदारण्यक उपनिषद)। भक्ति में यह ‘प्रेम विलय’ है, जैसे मीरा का कृष्ण में लीन होना।वैज्ञानिक कोण: fMRI अध्ययन (हार्वर्ड रिसर्च) दिखाते हैं कि गहन ध्यान में ‘डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क’ शांत होता है, शून्य अनुभव आता—महाशून्य में ‘नॉन-ड्यूअल अवेयरनेस’।