गीता का आत्मज्ञान: प्रेम, भक्ति और कर्मयोग से जीवन परिवर्तन

गीता में छिपे आत्मज्ञान के गहन संदेश जीवन की दिशा बदल देते हैं इसे पढ़ना समझना जीवन मे उतारना ओर अनुवभव से प्रेम भक्ति ज्ञान स माधि , ओर गुरु के प्रति आस्था और जो स्वम् में यातम विस्वास जाग्रत हुवा वहः मेरे लिए अनोखा अनुभव रहा जीवन मे पफेम ही से। कुछ है ओर प्रेम और आत्मविस्वास ओर व्यवहार से संसार की मोह माया को जीता जा सकता है और स्वम् मोक्ष को पा सकता है क्योंकि वे अहंकार, मोह और फलाशा से मुक्ति दिलाते हैं। यह ज्ञान निष्काम कर्मयोग, भक्ति और विवेक से आत्मा का साक्षात्कार कराता है। विस्तार से दोहों (श्लोकों) सहित समझें कि आध्यात्मिक साधना क्या है और कृष्ण का अर्जुन के लिए रोल।आत्मज्ञान के प्रमुख श्लोकगीता अध्याय 2 के श्लोक 13: “देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥” – जैसे शरीर में बाल्यावस्था से यौवन फिर जरा आती है, वैसे ही आत्मा नया शरीर धारण करती है, बुद्धिमान इससे मोहित नहीं होता। यह ज्ञान जीवन बदलता है, क्योंकि मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। अध्याय 2 श्लोक 47: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” – कर्म में अधिकार है, फल में कभी नहीं; फल की आशा मत करो, अकर्मण्यता में आसक्ति भी मत रखो। गहन चिंतन से यह सिखाता है कि निष्काम भाव से कार्य करने से शांति मिलती है।आध्यात्मिक साधना का सारसच्ची आध्यात्मिक साधना बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि अंतर्मन की शुद्धि है। अध्याय 4 श्लोक 12: “काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं भवति धर्मफलः स्वकर्मविबधनतः॥” – इच्छुक देवताओं की पूजा से फल जल्दी मिलता है, पर यह बंधन पैदा करता है। गीता 12 साधनाओं (यज्ञों) का वर्णन करती है, जैसे अध्याय 4 में ज्ञानयज्ञ, दानयज्ञ, तपयज्ञ। अध्याय 6 श्लोक 16: “नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥” – न बहुत खाने वाले, न उपवास करने वाले, न बहुत सोने वाले को योग सिद्ध होता है। साधना है – विवेकपूर्ण जीवन, ध्यान, भक्ति और कर्मयोग से आत्मसंयम।कृष्ण का अर्जुन प्रति रोलकृष्ण अर्जुन के सारथी बने, अर्थात् जीवनरथ के मार्गदर्शक और आंतरिक गुरु। अध्याय 11 श्लोक 33: “तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यम् समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निर्ममोऽहं विगतद्वेषः समाचर॥” – उठो, विजय प्राप्त कर राज्य भोगो; शत्रु पहले से मेरे द्वारा मारे गए हैं, निष्काम भाव से कार्य कर। वे मित्र, गुरु और परमात्मा के रूप में मोह नष्ट कर धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करते हैं। अर्जुन के संशय पर गीता उपदेश देकर कर्तव्य पथ दिखाया, जो हर साधक के लिए प्रतीक है – ईश्वर आंतरिक शक्ति प्रदान करते हैं

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