2025 गुजर रहा है और 2026 आ रहा है मैन पिछले सालों।में क्या पाया पिछले कई वर्षों में मैने ध्यान या सोयी या जाग्रत अवस्था में सद्गुरु की मृत्यु के पश्चात उनकी आत्मा शिष्य के सूक्ष्म शरीर से आत्मा-स्तर पर उस लोक से आकर वारतालाप या संवाद मुख से करती है जो शिष्य को साफ साफ सुनाई ओर अनुभव होते है वहः समझ जाता है कि मेरे गुरु मुझसे क्या कह रहे है और अपने साथ शुक्ष्म शरीर को ब्रह्माण्ड के किस लोक की सैर करवा कर उसे सीखने के लिए किन किन लोको से गुजरते है औरअनुभव करवाते है ओर शिष्य के अंदर से कसम क्रोध लोभ मोह अहंकार घृणा और जलन को आंतरिक मन से दूर करवाते है उनकी आत्मा जो पाठ सिखाती है या जो।क्रिया वो करती है, जो जाग्रत अवस्था में शिष्य द्वारा ग्रहण और अपनाया जाता है। जो शिष्य को मस्तिष्क पटल।पर उठने पर याद रहता है कि बार दिन में गुरु की आत्मा शिष्य के चारो ओर चक्राकार घूमती नजर आती है जो पारदर्शी होती है और गुरु के शरीर का आकार लिए होती है यह गुरु-शिष्य संबंध का सूक्ष्म आयाम है, जहां साधना से प्राप्त संदेश जीवन में मार्गदर्शन बन जाते हैं।संवाद की प्रक्रियासुरत शब्द योग या ध्यान में शिष्य की सुरत (आत्मा) आंतरिक शब्द से जुड़ती है, तब सद्गुरु का सूक्ष्म रूप प्रकाश या नाद के माध्यम से वाणी देता है। रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों के उदाहरणों में गुरु सूक्ष्म शरीर से शिष्य की आत्मा को मृत्यु-काल या ध्यान में ले जाते हैं। सोयी अवस्था (स्वप्न या सुषुप्ति) में यह संदेश कारण शरीर तक पहुँचते हैं।जाग्रत अवस्था में अपनानाशिष्य ध्यान से प्राप्त वचन को जागृत मन से विवेकपूर्वक ग्रहण करता है, जो कर्म और निर्णयों में प्रतिबिंबित होता है। संतमत में यह गुरु कृपा से होता है, जहां भंवर गुफा या त्रिकुटी पार कर संवाद स्थायी बनता है। कबीर परंपरा में गुरु वचन जीवन-भर मार्गदर्शक रहता है।आध्यात्मिक महत्वयह प्रक्रिया मोक्ष मार्ग का हिस्सा है, जहां मृत्यु पश्चात भी गुरु शिष्य को शरण देते हैं। सूफी बाटिनी सोहबत या वेदांत में समान—आत्मा का एकत्व। नियमित सिमरन से यह अनुभव गहन होता है।सूक्ष्म शरीर से गुरु का संपर्क ध्यान, नाम सिमरन और समर्पण से होता है, जहाँ शिष्य की चेतना गुरु की सूक्ष्म शक्ति से जुड़ती है। यह आंतरिक संवाद प्रकाश, नाद या भाव के रूप में अनुभव होता है, जो जागृत अवस्था में मार्गदर्शन देता है।संपर्क स्थापित करने की विधिनियमित ध्यान में आज्ञा चक्र पर गुरु-रूप का ध्यान करें, सिमरन से सुरत शब्द से जुड़ें। प्राणायाम और मौन से सूक्ष्म शरीर शुद्ध होता है, तब गुरु की ऊर्जा स्वतः संचारित होती है। रामकृष्ण परमहंस की परंपरा में यह चेतना का एकत्व है।संकेत और अनुभवहृदय में कंपन, शांति या स्वप्न में दर्शन इसके संकेत हैं। संतमत में भंवर गुफा पार कर यह स्थायी बनता है, शिष्य का अहंकार विलीन हो जाता है। गुरु कृपा से कर्म बंधन टूटते हैं।साधना के फलयह संपर्क मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करता है, मृत्यु पश्चात भी गुरु शरण देते हैं। सूफी बाटिनी सोहबत या वेदांत में समान अनुभूति। दैनिक अभ्यास से गहनता बढ़ती है।सूक्ष्म शरीर में गुरु का अनुभव सतत बनाने के लिए निरंतर समर्पण, सिमरन और विवेकपूर्ण जीवन आवश्यक है। नियमित ध्यान से यह चेतना का स्थायी एकत्व बन जाता है, जहां गुरु हर क्षण उपस्थित प्रतीत होते हैं।गुरु कृपा से अनाहद नाद शून्यता का द्वार खोलता है—नाद सुनते हुए शून्य में लीन हों, तब अलौकिक एकत्व प्राप्ति होती है। मेरी ३५ वर्षों की साधना इसीबात का प्रमाण है जिसमे मैं अपने भाइयों से अलग हुवा तिरस्कार पाया और खुद ने आगे बढ़ने के लिए प्रयास किये और मंजिल।पाई मुझे न कोई नाम न कोई प्रमाण पत्र चाहिए बस चशिये गुरु रूप में माता पिता का आशीर्वाद व जिन संतो ने कृपा बक्शी है उनक्स अनमोलआश्रीरवाद मेरे ३५ वर्षों की गुरु साधना से प्राप्त अनाहद, सहन शक्ति एवं शून्यता में शून्यता का अलौकिक अनुभव सच्ची सिद्धि का प्रमाण है। यह दुर्लभ अवस्था गुरु कृपा से ही संभव होती है, जहाँ साधक अहंकार विलीन कर परम शांति पाता है।अनाहद नाद का महत्वअनाहद नाद गुरु दीक्षा से जागृत होने वाली आंतरिक दिव्य ध्वनि है, जो सिमरन से अजपा जाप बनती है। यह हृदय चक्र से उत्पन्न होकर समाधि की ओर ले जाती है, बिना गुरु के असंभव मानी जाती है।शून्यता की अवस्थाशून्यता में शून्य होना ध्यान की परिपक्व अवस्था है, जहाँ शरीर भारहीन हो जाता है तथा साधक निर्लिप्त होकर ब्रह्मांडीय एकता अनुभव करता है। सहन से यह केशून्य (पूर्ण शून्य) बनती है, मोह भंग हो जाता है।गुरु साधना की दुर्लभता३५ वर्षों में ऐसी सिद्धि हर साधक को नहीं मिलती, क्योंकि इसमें पूर्ण समर्पण, विवेक एवं गुरु की तवज्जोह आवश्यक है। संत परंपरा में यह मोक्ष मार्ग का द्वार खोलती है, सूफी फना से समान।सतत बनाए रखने के उपायनियमित सिमरन, मौन एवं भंवर गुफा जागरण से इस अनुभव को स्थायी बनाएँ। जागृत अवस्था में विवेक से ग्रहण करें, तब जीवनमुक्ति निश्चित है और मैं मेरे गुरु की कृपा जो मिली और उससे प्रेरित हो कर उनकी याद में जो स्मृति केंद्र बनाया है मेरे लिए जीवन मुक्क्त होने के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है जहाँ मुझे मेरे गुरु जिन्होंने प्रथम बार कृपा की दादा के रूप में ठाकुर रामसिंह जी और मा दर्शना देवी और पिता डॉक्टर चंद्र गुप्ता के इस नववर्ष के आगमन पर मेरा पुरा परिवार व उनके अपनाए सभी सत्संगी जो उनकी सेवा में घर पर आते है और सपरितुळ सत्संग व सोहम के सभी सदस्य उनसे आर्शीवाद ओर आगे बढ़ाने के लिए फिर से आशीर्वाद चाहते है