पिताजी साहब का अध्यात्म में जब भी ध्यान या पूजा करवाते थे शुरू शुरू में शिष्य को कोई भी धार्मिक पूजा करने को।कहते उससे उसमे प्रेम भक्ति और ज्ञान को उतपन्न हो उसको ध्यान करना सिखाते ओर जब ध्यान में परिपक़व हो जाता तो उसे समाधि की शिक्षा से पूर्ण कर उसे शून्य में स्तिथ कर देते थे और जब शिष्य के समझ ने ये आजाता की शुण्य के आगे और भी है तब उसे समझाते की योगियो का मुख्य खजाना जो उनके पास है वहः नाद ब्रह्म जो आध्यत्मिकता में सर्वोच्च रूहानी रहषय का भेद है जो समर्थ गुरु शिष्य में पूर्ण परिवक्ता आने पर देते है जो लाखो ।के से कोई एक होता है हर शिष्य इस अवस्था तक नही।पहुचता ओर प्रेम भक्ति ज्ञान ध्यान की सीमा तक ही पहुच पाता है जो शिष्य गुरु की अंतर दृस्टि पा कर निपुण हो जाता है वहः इस अनाहद के माध्यम से शुण्य से महाशून्य की ओर बढ़ता है और अनंत में उस सागर में मिल जाता है जहाँ दुनिया का अंत यानी प्रलय से पूर्व ईश्वर में लय हो उस स्थान पर फिक्स हो।जाता है जहां न ज म है न म्रत्यु बस परम शांति वो भी गुरु के साथ लय हो कर जब गुरु इस अनाहद आवाज से शिष्य को अपनी रूह के साथ जोड़ता है तब तववजुहू से शिष्य के रोम रोम में नाद जिसे भारतीय संस्कृति में ओम माना गया है ये आवाज उसके रोम रोम में पैदा हो जाती है और शिष्य सही रूप में महा समाधि की स्तिथि में पहुच अपने अस्तित्व को भूल।गुरु के असतित्व में मिल जाता है लोक।परलोक।की कोई नियामत इस अनाहद का मुकाबला नही कर सकती संत बुल्लेशाह ने इस आवाज को बंसी अचरज कान्हा बजाइ ये शरीर की आत्मा की धुन जो शरीर से निकल रही होती है ये शरीर के विभिन्न स्थानों में अलग अलग जगह पर सुनाई देती है औरघट घट में ये आवाज गूंजती हैये ध्वनि अन्य ध्वनि से अलग है ये ध्वनि गुरु की कृपा से पैदा होती है जो अविनाशी होती मरत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर के साथ उस लोक तक चली जाती है जहां परमात्मा का मूल निवास है ये आवाज कोई कोई ही पहुचा हुवा शिष्य जिसे गुरु देते है वही अनुभव करता है अन्य नीचे के स्तर पर ही रह जाते है ये अनाहद शब्द निराकार निर्लेप ओर अकृतिम है