यह प्रश्न पुराण-कथा से अधिक आध्यात्मिक प्रतीक (symbolism) का है।विष्णु का शेषनाग की शय्या पर शयन — एक गूढ़ तत्त्व-बोध है।आइए इसे तीन स्तरों पर समझें: कथा, तत्त्व, और अनुभव शेषनाग कौन है?शेष का अर्थ है — जो शेष रह जाता है।जब सृष्टि, विचार, नाम-रूप सब लय में चले जाते हैं —जो बचता है, वही शेष है।अद्वैत में इसे कहते हैं:साक्षी-चैतन्य — जो कभी नष्ट नहीं होता।नाग (सर्प) का प्रतीक:ऊर्जाचेतना की गतिकुंडलिनीअर्थात शेषनाग = शुद्ध, अविनाशी चेतना-ऊर्जा विष्णु क्यों शयन कर रहे हैं?विष्णु का शयन अज्ञान या निष्क्रियता नहीं है।यह है:योग-निद्रावह अवस्था जहाँ ईश्वर कर्म भी करता है और अकर्ता भी रहता हैगीता की भाषा में:“न मां कर्माणि लिम्पन्ति”कर्म होते हैं, पर करने वाला कोई नहीं।अर्थात — सृष्टि चल रही है, पर मूल सत्ता विश्राम में है। शेषनाग की शय्या — क्या संकेत है?इसका गूढ़ अर्थ है:परमात्मा चेतना पर ही विश्राम करता है।विष्णु = व्यापक चेतनाशेष = अविनाशी आधारशयन = पूर्ण संतुलन, पूर्ण तृप्तियह दिखाता है कि — ईश्वर को किसी बाहरी सहारे की ज़रूरत नहीं,वह स्वयं अपने ही स्वरूप में स्थित है समुद्र पर शयन क्यों?वह समुद्र है क्षीर-सागर —जो प्रतीक है अचेतन / अव्यक्त का।अर्थात:विचारों से पहले की अवस्थानाम-रूप से पहले का अस्तित्वविष्णु वहाँ शयन कर रहे हैं —मतलब चेतना अव्यक्त में स्थित हैमानव के लिए संकेत (सबसे महत्वपूर्ण)यह चित्र हमें बताता है:जब मन (सर्प-ऊर्जा) शुद्ध हो जाता हैऔर अहं (जाग्रत कर्ता) शयन कर जाता हैतब भीतर का विष्णु प्रकट होता है।ध्यान में जब विचार थमते हैं —तभी “शेष” बचता है।सार वाक्य:विष्णु शेषनाग पर इसलिए शयन करते हैंक्योंकि परम चेतना केवल उसी पर टिकती हैजो नष्ट नहीं होता।