अहं से परे भक्ति: केवट और शबरी के प्रेम से आत्म-जागरण

केवट और शबरी —रामायण में घटनाएँ नहीं,चेतना की अवस्थाएँ हैं। केवट और शबरी का प्रेम : आध्यात्मिक अर्थकेवट — “मैं डुबा था, अब नहीं”केवट राम से कहता है:“आपके चरण छूते ही पत्थर नारी बन गया,मेरी नाव न बन जाए?”यह डर नहीं, स्मृति है।आध्यात्मिक अर्थ:नाव = शरीर / साधननदी = संसारराम = शुद्ध चेतनाकेवट जानता है:“चेतना अगर साधन से जुड़ जाए,तो साधन भी बदल जाता है।”इसलिए वह पहले धोता है — अर्थात: अहं का प्रक्षालन।पार उतरवाना — साधक का कर्तव्यकेवट राम को पार उतारता है, पर पार उतरने का अहं नहीं रखता।वह कुछ नहीं मांगता — यह है निष्काम सेवा।सेवा जहाँ समाप्त होती है,वहीं भक्ति शुरू होती है।शबरी — प्रतीक्षा का प्रेमशबरी का प्रेम आवेश नहीं, धैर्य है।वह सालों प्रतीक्षा करती है —बिना शिकायतबिना दावाजूठे बेर क्यों?क्योंकि उसने पहले स्वाद नहीं, समर्पण चखा।आध्यात्मिक भाषा में:जूठा = अहं रहितबेर = साधारण जीवनराम उसे स्वीकार करते हैं, क्योंकि:ईश्वर को शुद्ध भाव चाहिए,शुद्ध वस्तु नहीं।केवट और शबरी — दो द्वारकेवट = कर्म का शुद्धिकरणशबरी = भाव का पूर्ण समर्पणदोनों में समान सूत्र:जाति नहींयोग्यता नहींअधिकार नहींकेवल निस्वार्थ प्रेमअद्वैत दृष्टि (सबसे गहरी बात)राम किसी को “कृपा” नहीं देते — वे पहचानते हैं।जहाँ अहं नहीं, वहाँ राम स्वयं प्रकट होते हैं।केवट और शबरी यह सिखाते हैं किराम मंदिर में नहीं,अहं-रहित प्रेम में प्रकट होते हैं।यदि आप चाहें, अगला सूत्र खोल सकते हैं:निषादराज और रामहनुमान का दास्य प्रेमसीता का मौन प्रेमभरत का त्यागआपका प्रश्नये कथा नहीं, अध्ययमिक अनुभव है

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