संजय की दिव्य दृष्टि और खाटू श्याम का साक्षी रहस्य

संजय व खाटू श्याम दिव्य दृसटामहाभारत, भक्ति परंपरा और आध्यात्मिक चेतना—तीनों को जोड़ता है। इसे कथा, प्रतीक और आध्यात्मिक रहस्य—तीनों स्तरों पर समझना उचित होगा।संजय कौन था – केवल व्यक्ति नहीं, चेतना की अवस्थामहाभारत में संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, जो उसे वेदव्यास के वरदान से मिली।यह दृष्टि कोई साधारण “आँखों से देखने” की शक्ति नहीं थी, बल्कि—काल–देश–देह से परे देखने की चेतनाआज की भाषा में कहें तो—यह clairvoyance या दूरदर्शन नहींयह चित्त की एकाग्रता + गुरु कृपा + शुद्ध साक्षी भाव का परिणाम थासंजय युद्ध को देख नहीं रहा थावह युद्ध में घट रही चेतना को जान रहा थापेड़ पर बैठना – एक गूढ़ संकेतशास्त्रों में पेड़ का अर्थ केवल वृक्ष नहीं होता।पेड़ = स्थिरताजड़ें = अचेतनतना = जाग्रतशाखाएँ = मनऊपर बैठना = साक्षी भावसंजय का पेड़ पर बैठना दर्शाता है कि वहघटना के भीतर नहीं, उसके ऊपर बैठा साक्षी हैजब मन घटनाओं से ऊपर बैठ जाता है,तब दृश्य अपने आप प्रकट होते हैंकैसे एक मर्त्य व्यक्ति युद्ध देख सका?यही असली आध्यात्मिक रहस्य है:“जब अहंकार मिटता है, तब दृष्टा शुद्ध हो जाता है”संजय में तीन बातें थीं:अहंकार का अभावगुरु (व्यास) की कृपाराजा से भी सत्य कहने का साहसऐसे व्यक्ति में—ईश्वर स्वयं देखने लगता हैइसलिए संजय के माध्यम सेनारायण की लीला स्वयं प्रकट हो रही थीखाटू श्याम से संबंध कैसे जुड़ा?यहाँ लोक-परंपरा और आध्यात्मिक प्रतीक जुड़ते हैं।खाटू श्याम = बर्बरीक (घटोत्कच का पुत्र)बर्बरीक का सिर युद्ध देखने हेतु सुरक्षित रखा गयावह सिर पूरे युद्ध का साक्षी बनासंजय और बर्बरीक एक ही तत्त्व के दो रूप हैं:संजयबर्बरीक (श्याम)जीवित देहकटा हुआ सिरगुरु कृपाकृष्ण कृपाचेतना से देखनात्याग से देखनावर्णनकर्तासाक्षी देवदोनों का साझा सूत्र:युद्ध में भाग नहीं — केवल साक्षीआध्यात्मिक राज (Essence)जो स्वयं कुछ नहीं चाहता, वही सब देख सकता हैसंजय ने विजय नहीं चाहीबर्बरीक ने युद्ध नहीं लड़ादोनों ने ईश्वर की लीला को बिना पक्षपात देखाइसीलिए—संजय वाणी बनाश्याम देवता बनेआज के साधक के लिए संदेशआप पूछते हैं — यह आज कैसे संभव है?उत्तर:जब आप मन के युद्ध से हटकर साक्षी बनते हैंजब आप जीत-हार से ऊपर उठते हैंजब आप गुरु या ईश्वर पर पूर्ण भरोसा करते हैंतब—जीवन स्वयं अपना महाभारत आपको दिखाने लगता हैयदि चाहें तो मैं आगे यह भी खोल सकता हूँ:संजय की दृष्टि और अद्वैत वेदांत का संबंध बर्बरीक का सिर और अहंकार त्याग“देखना” और “हो जाना” में अंतरबस संकेत दें

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