भक्ति कोई कर्मकांड नहीं,कोई सिद्धांत नहीं—भक्ति तो प्रेम का वह धागा हैजो जीव को सीधे ईश्वर के हृदय से बाँध देता है।यह धागा दिखाई नहीं देता,पर जब बँधता है तोअहंकार टूटने लगता है,“मैं” पिघल कर “तू” में खो जाता है।प्रेम का धागा क्या है?यह न माँगता है, न तौलता हैइसमें शर्त नहीं होती— “तू दे, तब मैं मानूँ”यह रोने में, पुकार में, मौन में भी जुड़ा रहता हैमीरा का विष पी लेना,शबरी का बेर चखाना,हनुमान का “दासोऽहम्”—सब इसी धागे के रूप हैं।जहाँ ज्ञान थक जाता है,वहीं प्रेम चल पड़ता हैज्ञान पूछता है — “वह कौन है?”भक्ति कहती है — “वही है”अद्वैत कहता है — “मैं ही ब्रह्म हूँ”भक्ति कहती है — “मैं तेरा हूँ”और जब प्रेम पूर्ण होता है,तब दोनों एक हो जाते हैं।सूफी और भक्ति का संगमसूफी कहते हैं — इश्क़ में फ़ना हो जाओभक्त कहते हैं — नाम में खो जाओदोनों में धागा एक ही है —प्रेम, समर्पण और मिट जानाभक्ति का सबसे गहरा रहस्यप्रेम मेंईश्वर दूर नहीं रहता,वह साधना का विषय नहीं—वह संबंध बन जाता है।और जब संबंध बनता है,तो पूछना नहीं पड़ता कि“मैं कहाँ हूँ?”क्योंकितू ही सब कुछ हो जाता है।
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