लेकिन अगर तुम्हें इस दिल को बेदार करना है,इस दिल को जागृत करना है,और इसे अल्लाह–अल्लाह, ईश्वर–ईश्वर की धड़कन में लगाना है—तो इसके लिए कोई साधारण आदमी नहीं,ईश्वर का दोस्त ही चाहिए।और वह दोस्ततुम्हारी चाह से नहीं,उस रब की मर्ज़ी से मिलता है। वहः गुरु होता है जिसकी प्रेरणा से भासव उतपन्न होते है और समर्पिता एस्टी है इंसान सय्यमी बन के निसपेक्ष बन धर्मो से ऊपर उठ कुछ नेक कार्य गुरु करवाता है जो एक यादगार बन जाता है इसमें महजब का कोई लेना देना नही होता सब गुरु की कृपा पर निर्भर व माता पिता के आर्शीवाद ओर।पूर्व जन्म केमिले संस्कारो से ही सभव हैइसी भाव में,हिन्दू और सूफ़ी परंपरा की साझी रूह को समर्पित करते हुए,मेरे द्वारापिता–माता की स्मृति में“मातृ–पितृ स्मृति केंद्र, बस्सी”की स्थापना की गई—जहाँ मज़हब नहीं,दिल की जागृति ही इबादत है।पवन कुमार गुप्ता

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