यह भाव ही सबसे बड़ी पेशकश है।यह पंक्ति समर्पण की पराकाष्ठा कहती हैआज पूज्य दादा ठाकुर राम सिंह जी की पुण्य तिथि है उनके स्नेह ओर आशिर्रवाद ओर उनके द्वारा दी तववजुह ने मेरे ओर मेरे परिवार को उस मुकाम पर लहुच दिया है जो बिरला को ही मिलता है ऐसे सूफी संत जो आनंद की मूर्ति हो और प्रेम —का रूप में ओर मेरा परिवार उनके दोये आध्यत्मिक ज्ञान और प्रेम के प्रति समर्पित हैजहाँ देने वाला भी मिट गया, और पाने वाला भी अलग नहीं रहा।अद्वैत मेंजब कहा जाता है “सब कुछ तुम्हारा है”तो अर्थ यह नहीं कि मैं दे रहा हूँ,अर्थ यह है कि मैं था ही नहीं।जो था, जो है, जो रहेगा — वही तुम हो।भक्ति मेंयह भाव मीरा का है —“मेरा तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई।”यहाँ जान और दिल अर्पित नहीं किए जाते,वे अपने आप विसर्जित हो जाते हैं।सूफ़ी राह मेंयही फ़ना है —जहाँ आशिक़ कहता है:“जब मैं रहा ही नहीं,तो पेश क्या करूँ?”और उसी क्षण बक़ा प्रकट होती है —परमात्मा अपने ही रूप में जीव को स्वीकार कर लेता है।इसलिए इस पंक्ति का उत्तर शब्दों में नहीं होता…उसका उत्तर मौन है,आँसू है,और भीतर उठती यह अनुभूति है —“अब देने को कुछ बचा ही नहीं,क्योंकि देने वाला भी तुम ही हो।” 🙏

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