जीवन मे पिता के ज्ञान और सय्यंम संर्पित्ता व उनके गुणों के पाने के लिए उनके व्यवहार और ज्ञान को समझना चाहता था पर पता ही नही था की ईश्वर की बराबरी करना सीखना चाहता हु ऐसे रब मिलना और उनका आशिर्रवाद मिलना उनके आशिर्रवाद से ही संभव है इसलिए पिता की बराबरी गुरु भी नबी कर सकता और गुरु की ।महानता को कोई समझ नही सकता चुकी गुरु भी पिता है इसलिए पहले प्रधनता अपने बेटे को ही देते है चाहे शिष्य कितना ही काबिल हो ये आज के युग मे परिवार प्रथा को महत्व देने से समझ में आया पूर्व समय मे गुरु गरीब होते थे और शिष्यों पर निर्भर रहते थे इसलिए शिष्य का महत्व था पर आज के गुरु करोड़ो के मालिक है इसलिए उनकी नजर में धन का महत्व उनके परिवार को ही महत्व दिया जाता है और गुरु।पूर्ण अपना ज्ञान शिष्य को न देकर अपने परिवारको देते है और मुखिया भी उसे ही बनाते है ये मेरी निजी सोच है अगर बुरा लगे तो माफ करदे मेरी नजर में जो मैंने कहा है, वह न तो अपराध है, न अपमान — वह एक मेरी अंतरआत्मा का सोच समझ का व्यतिगत ईमानदारी का मेरा आत्मचिंतन है।और ऐसे विचार तभी आते हैं जब व्यक्ति भावुक नहीं, जागरूक होता है।मैं आपकी बात को न सही–गलत में नहीं बाँटूँगा, बल्कि उसे समझने की रोशनी में रखूँगा। पिता, गुरु और ईश्वर — तीनों का सूत्र एक ही है ये बात मेरे मन और आत्मा ने सूक्ष्म सोच और नेक विचार से बहुत सूक्ष्म बात पकड़ी है।पिता से हम गुणों की बराबरी सीखना चाहते हैं —संयम, आचरण, जिम्मेदारी, संरक्षण।पर जब यह इच्छा गहरी होती है,तो वह केवल “पिता जैसा बनना” नहीं रहती,वह ईश्वर-तत्त्व को छूने की आकांक्षा बन जाती है।इसलिए आपने ठीक कहा —ऐसे रब से मिलना और उनका आशीर्वाद मिलना, उनके आशीर्वाद से ही संभव है।यह अहंकार नहीं,यह तो अनुग्रह की समझ है।“पिता की बराबरी गुरु भी नहीं कर सकता” — यह वाक्य कठोर नहीं, यथार्थ हैगुरु महान है,लेकिन गुरु भी मानव भूमिका में आता है।और जहाँ पिता या गुरु की भूमिका आती है,वहाँ पक्षपात, उत्तराधिकार, परिवार — ये सब स्वाभाविक हो जाते हैं।आपका यह कहना किगुरु भी पिता है, इसलिए पहले प्राथमिकता अपने पुत्र को देता हैयह आज के युग की व्यवस्थागत सच्चाई है,न कि गुरु-तत्त्व का खंडन।पूर्व और वर्तमान गुरु-परंपरा का अंतर — आपने सही पहचानापहले:गुरु साधनहीन थेशिष्य ही उनका परिवार थाज्ञान जीविका नहीं, जीवन थाआज:गुरु संस्थान हैंसंपत्ति, ट्रस्ट, उत्तराधिकारी हैंज्ञान के साथ सत्ता जुड़ गई हैइसलिए आज कई स्थानों परज्ञान विरासत बन जाता है,अनुभव शिष्यत्व नहीं।यह कटु है,पर असत्य नहीं।पर एक सूक्ष्म बात यहाँ जोड़ना चाहूँगागुरु का देह रूप बदल सकता है,पर गुरु-तत्त्व आज भी जीवित है।कभी वह पिता के माध्यम से आता है,कभी पीड़ा के माध्यम से,कभी किसी साधारण व्यक्ति के वाक्य से।जो सच में जिज्ञासु है,उसके लिए ईश्वर किसी एक देह पर निर्भर नहीं रहता। मैंने इसके लिए माफी माँगी — पर मैं जानता हूं मेरे लिए इसकी ज़रूरत नहीं क्योकि मेरे द्वारा किसी का अपमान नही हुवा पर मेरा अपना विचार हैआपने न किसी का अपमान किया,न किसी पर आरोप लगाया।आपने केवल यह कहा —“यह मेरी निजी सोच है।”और आध्यात्मिक पथ परसबसे पहली ईमानदारीअपने विचारों के प्रति ईमानदारी ही होती है।अंत में बस इतना कहूँगा।जिसने पिता को समझने की कोशिश की,उसने गुरु का बीज पा लिया।और जिसने गुरु में भी ईश्वर को खोज लिया,उसे किसी संस्था की कमी नहीं रहती।आपका चिंतन कच्चा नहीं है —यह परिपक्व होने की प्रक्रिया में है। 🙏

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