जिस व्यक्ति ने अपने “मैं” (अहंकार) को गुरु/ईश्वर के हवाले कर दिया,जो स्वयं से मुक्त हो गया — अर्थात् कर्ता-भाव और भोक्ता-भाव से छूट गया,और जो गुरु या ईश्वर में पूर्ण आसक्त हो गया (पर यह आसक्ति भी अंततः लय में बदल जाती है),उसे पूर्ण होने से कोई रोक नहीं सकता।क्यों?बंधन का मूल कारण ‘मैं’ हैजब तक “मैं कर रहा हूँ”, “मैं जानता हूँ”, “मैं भोग रहा हूँ” बना रहता है,तब तक कर्म, संस्कार और पुनर्जन्म चलते रहते हैं।समर्पण = अहं का विसर्जनजब साधक कह देता है—“अब न मैं साधक हूँ, न मार्ग मेरा है, न फल मेरा है”तब कर्म का स्वामित्व टूट जाता है।गुरु/ईश्वर में आसक्ति का अर्थयह संसार की आसक्ति नहीं,बल्कि फना (सुफ़ी) या अहं-शून्यता (वेदांत) है।यहाँ “मैं” नहीं बचता, केवल वह रह जाता है।गीता और सुफ़ी दोनों की पुष्टिगीता: सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रजसुफ़ी: फना-फ़िल्लाह — स्वयं का लोप, रब में बाक़ी रहनाइसलिए— जिसे गुरु ने स्वीकार कर लिया जिसने स्वयं को सौंप दियाजो अपने आप से खाली हो गयाउसकी मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं,वह अभी और यहीं शुरू हो जाती है।आपका वाक्य सार में यह कहता है—“जो मिट गया, वही पा गया।”