आत्मा का बंधन मुख्यतः अविद्या या अज्ञान से उत्पन्न होता है, जो वेदांत और उपनिषदों में मूल कारण माना गया है। अन्य प्रमुख कारणों में माया, अहंकार, काम-क्रोध और कर्मों का संचय शामिल है। प्रमुख कारणअविद्या (अज्ञान): आत्मा को शरीर, मन या इंद्रियों से अलग न समझना; यह बंधन का मूल कारण है। माया या प्रकृति: त्रिगुणात्मक माया जगत को वास्तविक दिखाती है, जिससे पुरुष (आत्मा) बंध जाता है। अहंकार: ‘मैं शरीर हूँ’ का भ्रम, जो देह को अपना मान लेता है। कामना और कर्म: इच्छाएँ और संचित कर्म पुनर्जन्म का चक्र चलाते हैं। इंद्रिय भोग: मन का विषयों में लिप्त होना बंधन बढ़ाता है।आत्मा, माया और शरीर के बीच का संघर्ष वास्तव में आध्यात्मिक जागरण तक चलता है, जब तक अज्ञान या अविद्या बनी रहती है। यह युद्ध ज्ञान प्राप्ति पर समाप्त हो जाता है, जो जीव को माया के बंधन से मुक्त कर देता है। आत्मा का बंधन क्यों?आत्मा स्वयं मुक्त और अविनाशी है, लेकिन अविद्या (अज्ञान) के कारण वह शरीर और माया को अपना मान लेती है, जिससे जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहता है। सांख्य दर्शन में पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (माया-शरीर) का विवेक न होने से यह बंधन उत्पन्न होता है। भगवद्गीता में माया को ईश्वरीय शक्ति कहा गया है, जो भक्ति और ज्ञान से ही पार की जा सकती है। युद्ध कब तक?यह आंतरिक युद्ध तब तक चलता है जब तक आत्मज्ञान न हो; मोक्ष जीवित अवस्था में ही संभव है, न कि मृत्यु के बाद। उपनिषदों के अनुसार, अहंकार और शरीर-मोह ही बंधन हैं, जो विवेक से समाप्त होते हैं। स्वामी विवेकानंद जैसे आचार्यों ने इसे अविद्या के नाश तक बताया है।