प्रश्न बहुत संवेदनशील और गहन है—क्योंकि सूफ़ी परंपरा में पूर्ण गुरु (कामिल मुर्शिद) का मूल्यांकन दावे से नहीं, हाल से होता है। आप पिताजी द्वारा बनाए गए शिष्य श्री भारतभूषण जी में जो लक्षण देखे गए हैं, उन्हें मैं सूफ़ीइज़्म की कसौटी पर साफ़-साफ़ रख रहा हूँ। सूफ़ीइज़्म में पूर्ण गुरु (Murshid-e-Kamil) के मुख्य लक्षण अहम (मैं) का लोप — फना वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता न अपनी प्रशंसा चाहता है, न प्रचार “मैं पहुँचा” जैसी भाषा से दूर रहता है सूफ़ी कहते हैं: “जिसमें ‘मैं’ बची, वह अभी राह में है।” हाल का असर — नज़र की तासीर उसके पास बैठने से मन शांत हो जाए बिना उपदेश के भीतर कुछ टूटता और घुलता महसूस हो शिष्य का अहं धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगे यह इल्म नहीं, नूर की पहचान है। शरीअत–तरीकत–हक़ीक़त का संतुलन आचरण में मर्यादा इबादत/साधना में पवित्रता भीतर से परम सत्य से जुड़ाव जो सिर्फ़ रस्म में अटका हो, या सिर्फ़ रहस्य बोले—वह कामिल नहीं। दुख-सुख में समान दृष्टि अपमान में भी प्रतिक्रिया नहीं मान में भी फूलता नहीं उसका स्थिर चित्त ही उसका प्रमाण होता है करामात नहीं, किरदार सूफ़ी परंपरा में: करामात (चमत्कार) पर्दा हो सकती है लेकिन किरदार ही असली गवाही है विनम्रता संयम करुणा मौन की गहराई शिष्य को अपने से नहीं, परम से जोड़ना वह शिष्य को अपना भक्त नहीं बनाता वह आपको अपने पैरों से नहीं, आपके भीतर झुकाता है गुरु-परंपरा से मौन संबंध वह अपने गुरु को भीतर जीवित रखता है नाम कम लेता है, लेकिन आज्ञा में जीता है गुरु की मेहर उसके हाल में बहती है निष्कर्ष (बहुत महत्वपूर्ण) सूफ़ीइज़्म में पूर्ण गुरु पद: घोषित नहीं किया जाता प्रमाणपत्र से नहीं मिलता और न ही उत्तराधिकार से अपने-आप मिल जाता है जो उनको।मिला है उसका प्रमाण सिर्फ़ यह है: क्या उसके सान्निध्य में लोग “खुद से खुद उ की।कृपा से अपने अंदर नाद महसूस कर प्रकाश में खो शुण्य हो जाते है मैंने आज देखा कि उनका शरीर अब शरीर नही प्रकाश के पुंज में बदल गया है और प्रकाश पुंज का वेग पृथ्वी से ऊपर सतलोक तक।पहुचता है जहाँ मुझे पिताजी के आने और उनमे लय होने का अहसास हुआ वो अपने अस्तित्व को भूल चुके है यदि कुछ याद है तो अपने गुरु का नाम उन्ही की बात करते है और उन्ही के बारे में सोचते है जब इंसान अपने गुरु में लय हो जाये तो यही स्तिथि होती है शरीर अस्वस्थ फिर भी गुरु की याद में बीमार होते हुवे भी दिल से आत्मा से जिंदा है पिताजी के द्वारा यू तो बहुत शिष्य बनाये गए जिनमे भारत भूषण भी साहब सबसे उच्च स्थान पर है और अन्य इस स्थान तक पहुचने की कोशिश कर रहे है कई गुरु को पिता के रूप में तो कोई गुरु को गुरु रूप में देखता है 60 वर्षो से मैं भाईसाहब की संगत में रहा और मेरे मन मे गद्दी न पाकर लोगो मे रुझान पैदा कर आध्यात्मिक बनाने का था इसीलिए मैंने पिताजी से कहा डैडी मैं तो वेश्या बनना मंजूर करूंगा ओर लोगो को आप तक पहुचाने का कार्य वेश्या बन नाच ओर डमरू के सहारे उन का ध्यान आकर्षित कर आप तक पहुचाने का कार्य करूंगा मुझे गद्दी नही चाहिए इसीलिए मैंने एक आश्रम सोहम ध्यान योग केंद्र का निर्माण पिताजी ने मुझसे करवाया और उसका नाम उन्होंने अपने माता पिता मि स्मृति में मातृ पितृ स्मृति रखा ये वाक्य मेरी बड़ी बहिन कमला बहिन जी के पास पिताजी के लिखे शब्द है और उसे उन्होंने ही सोहम ध्यान योग केंद्र नाम दिया
HomeVachanप्रश्न बहुत संवेदनशील और गहन है—क्योंकि सूफ़ी परंपरा में पूर्ण गुरु (कामिल मुर्शिद) का मूल्यांकन दावे से नहीं, हाल से होता है। आप पिताजी द्वारा बनाए गए शिष्य श्री भारतभूषण जी में जो लक्षण देखे गए हैं, उन्हें मैं सूफ़ीइज़्म की कसौटी पर साफ़-साफ़ रख रहा हूँ। सूफ़ीइज़्म में पूर्ण गुरु (Murshid-e-Kamil) के मुख्य लक्षण अहम (मैं) का लोप — फना वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता न अपनी प्रशंसा चाहता है, न प्रचार “मैं पहुँचा” जैसी भाषा से दूर रहता है सूफ़ी कहते हैं: “जिसमें ‘मैं’ बची, वह अभी राह में है।” हाल का असर — नज़र की तासीर उसके पास बैठने से मन शांत हो जाए बिना उपदेश के भीतर कुछ टूटता और घुलता महसूस हो शिष्य का अहं धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगे यह इल्म नहीं, नूर की पहचान है। शरीअत–तरीकत–हक़ीक़त का संतुलन आचरण में मर्यादा इबादत/साधना में पवित्रता भीतर से परम सत्य से जुड़ाव जो सिर्फ़ रस्म में अटका हो, या सिर्फ़ रहस्य बोले—वह कामिल नहीं। दुख-सुख में समान दृष्टि अपमान में भी प्रतिक्रिया नहीं मान में भी फूलता नहीं उसका स्थिर चित्त ही उसका प्रमाण होता है करामात नहीं, किरदार सूफ़ी परंपरा में: करामात (चमत्कार) पर्दा हो सकती है लेकिन किरदार ही असली गवाही है विनम्रता संयम करुणा मौन की गहराई शिष्य को अपने से नहीं, परम से जोड़ना वह शिष्य को अपना भक्त नहीं बनाता वह आपको अपने पैरों से नहीं, आपके भीतर झुकाता है गुरु-परंपरा से मौन संबंध वह अपने गुरु को भीतर जीवित रखता है नाम कम लेता है, लेकिन आज्ञा में जीता है गुरु की मेहर उसके हाल में बहती है निष्कर्ष (बहुत महत्वपूर्ण) सूफ़ीइज़्म में पूर्ण गुरु पद: घोषित नहीं किया जाता प्रमाणपत्र से नहीं मिलता और न ही उत्तराधिकार से अपने-आप मिल जाता है जो उनको।मिला है उसका प्रमाण सिर्फ़ यह है: क्या उसके सान्निध्य में लोग “खुद से खुद उ की।कृपा से अपने अंदर नाद महसूस कर प्रकाश में खो शुण्य हो जाते है मैंने आज देखा कि उनका शरीर अब शरीर नही प्रकाश के पुंज में बदल गया है और प्रकाश पुंज का वेग पृथ्वी से ऊपर सतलोक तक।पहुचता है जहाँ मुझे पिताजी के आने और उनमे लय होने का अहसास हुआ वो अपने अस्तित्व को भूल चुके है यदि कुछ याद है तो अपने गुरु का नाम उन्ही की बात करते है और उन्ही के बारे में सोचते है जब इंसान अपने गुरु में लय हो जाये तो यही स्तिथि होती है शरीर अस्वस्थ फिर भी गुरु की याद में बीमार होते हुवे भी दिल से आत्मा से जिंदा है पिताजी के द्वारा यू तो बहुत शिष्य बनाये गए जिनमे भारत भूषण भी साहब सबसे उच्च स्थान पर है और अन्य इस स्थान तक पहुचने की कोशिश कर रहे है कई गुरु को पिता के रूप में तो कोई गुरु को गुरु रूप में देखता है 60 वर्षो से मैं भाईसाहब की संगत में रहा और मेरे मन मे गद्दी न पाकर लोगो मे रुझान पैदा कर आध्यात्मिक बनाने का था इसीलिए मैंने पिताजी से कहा डैडी मैं तो वेश्या बनना मंजूर करूंगा ओर लोगो को आप तक पहुचाने का कार्य वेश्या बन नाच ओर डमरू के सहारे उन का ध्यान आकर्षित कर आप तक पहुचाने का कार्य करूंगा मुझे गद्दी नही चाहिए इसीलिए मैंने एक आश्रम सोहम ध्यान योग केंद्र का निर्माण पिताजी ने मुझसे करवाया और उसका नाम उन्होंने अपने माता पिता मि स्मृति में मातृ पितृ स्मृति रखा ये वाक्य मेरी बड़ी बहिन कमला बहिन जी के पास पिताजी के लिखे शब्द है और उसे उन्होंने ही सोहम ध्यान योग केंद्र नाम दिया