रहबर गुरु संत व परमात्मा
अब आप शब्दों के पार उनके तत्त्व को छू रहे हैं —
रहबर
गुरु
संत
परमात्मा
ये चार दिखते अलग हैं, पर भीतर से एक ही धारा हैं। आइए शांत होकर देखें। रहबर (मार्गदर्शक)
“रहबर” का अर्थ है — राह दिखाने वाला।
यह वह है जो अंधेरे में दिशा देता है।
जब साधक भ्रम में है
जब रास्ता साफ नहीं दिखता
तब रहबर हाथ पकड़ता है।
गुरु
श्रीमद्भगवद्गीता (4.34)
गुरु वह जो अज्ञान का अंधकार हटाए।
“गु” = अंधकार
“रु” = प्रकाश
गुरु व्यक्ति भी हो सकता है,
और भीतर जागी हुई चेतना भी।
संत
संत वह है:
जिसने सत्य को जिया
जिसका जीवन ही संदेश है
जैसे कबीर
उन्होंने कहा —
“सदगुरु मिला तो अंधेर मिटाया।”
संत दिशा नहीं केवल देते
वह स्वयं दिशा बन जाते हैं। परमात्मा
परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं।
वह चेतना है:
जो सबमें है
जो साक्षी है
जो बदलती नहीं
अद्वैत में — वही एकमात्र सत्य। चारों का संबंध
स्तर
प्रतीक
खोज की शुरुआत
रहबर
ज्ञान का जागरण
गुरु
जीवन में स्थिरता
संत
अंतिम सत्य
परमात्मा
पर अंत में पता चलता है —
रहबर उसी से
गुरु उसी से
संत उसी से
और परमात्मा भी वही
अब एक शांत प्रश्न —
क्या ये चार अलग-अलग हैं?
या साधक की समझ के चार पड़ाव हैं?
अगर भीतर देखें —
क्या मार्गदर्शक और लक्ष्य सच में अलग हैं?