आध्यात्मिक मार्ग में साधक सामान्यतः 5 प्रमुख अवस्थाओं से गुजरता है। जब इन अवस्था से गुजरता है तो उसके मन मे कई तरह के सवाल उठते है कि मैं जो कर रहा हु उससे मेरी मुक्ति होगी होगी या नही या मैं जो।कर रहा हु वो सत्य है फिर भी मन कहि न कही भटकता है इस अवस्था में मन की समझ को ओर इसमे प्राप्त अनुभव को समझने की जरूरत हैं। यही से
जिज्ञासा (खोज की शुरुआत) होती है
मैं जानता हूं वह वो अवस्था है जब मन में प्रश्न उठते हैं:
मैं कौन हूँ? ओर मेरे इस आध्यत्मिकजीवन का उद्देश्य क्या है?
केवल खाना-पीना और मर जाना ही जीवन है और क्या? इसी सोच से मन बदलता है और मन को कही न कही खुद से ही सवाल होता है क्या इसी लिए जीवन बना है और मेरा असतित्व क्या है ओर मरने के बाद क्या होगा यही भटकाव हमको अध्यायातम की ओर मोड़ कर सोचने पर मजबूर करता है
यहीं से भजन, ध्यान, गुरु की खोज शुरू होती है।
इस अवस्था में साधक को लगता है कि ईश्वर न कहीं हैस्वम के अंदर या बाहर है और उसे पाना है। साधना और शुद्धि की
इस अवस्था में साधक लग जाता और साधना नियमित करता है: ओर सोच ये की उसे हर हाल में पाना है ये दुनिया तो केवल जीने तक सीमित है इसके बाद सूक्ष्म शरीर का क्या होगा एहि से
भजन
सिमरन
ध्यान
तप और संयम
धीरे-धीरे मन की अशुद्धियाँ कम होती हैं और अंदर शांति और सूक्ष्म अनुभव आने लगते हैं।
यहीं कई लोगों को नाद, प्रकाश, या आंतरिक शांति के अनुभव करते हैं।ओर इसे पा लेते है ये एक अजूबा होता है यहां ध्यान समाधि ओर समाधि से महासमाधि ओर शुण्य में विलीन की समनः आती है अब
साक्षी भाव
यहाँ साधक समझने लगता है:
मैं शरीर नहीं हूँ
मैं मन नहीं हूँ
मैं विचारों का देखने वाला हूँ
इस अवस्था में साक्षी भाव प्रकट होता है।
जो भी हो रहा है – बस उसे देख ता रहता है एक साधक बनकर
यही वह अवस्था है जिसकी बात साधना में होती है—
“जो भी घटित हो रहा है उसको देखते रहना।”
शून्यता और वैराग्य
यह बहुत सूक्ष्म अवस्था है। यहाँ साधक को अनुभव होता है:
सब अस्थायी है
संसार एक स्वप्न जैसा है
कुछ भी पकड़ने लायक नहीं
यहीं वह विचार आता है जो कहा:
“जब सब छोड़कर जाना है तो भजन-ध्यान किसके लिए?”
यह अवस्था शून्यता और गहरी विरक्ति की होती है।
लेकिन यह अंतिम मंज़िल नहीं, बल्कि द्वार है।
पूर्णता (अद्वैत अनुभव)
जब साधक शून्य से भी आगे जाता है तो एक गहरी अनुभूति होती है:
शून्य भी मैं हूँ
ब्रह्मांड भी मैं हूँ
देखने वाला और देखा जाने वाला एक ही है
यही अद्वैत है।
यहाँ भजन करना या न करना प्रश्न ही नहीं रहता।
क्योंकि तब सब कुछ उसी की लीला दिखाई देता है।
संत इसी अवस्था में कहते हैं:
“शून्य में पूर्ण ब्रह्म छिपा है।”
एक महत्वपूर्ण बात:
अक्सर साधक चौथी अवस्था (शून्यता) में कुछ समय के लिए रुक जाता है और उसे लगता है कि सब व्यर्थ है।जीवन मे मैंने मुव्ह नही पायासब यर्थ ही गया मेरा जीना बेकार है और आत्महत्या करने की इच्छा होती है पर गुरु की कृपा से गुरु कृपा कर उसे इस अवस्था से मुक्त कर महा शुण्य की ओर ले जाता है और ध्यान साधना के अनुभव से काले विराट आंतरिक्ष में रोशनी के एक बिंदु को देखता है जहां गुरु है और शिष्य को पुकार रहे है बस कुछ ही दूर का फासला है तुम्हे आंतरिक्ष का समुंदर पार कर आना होगा इससे शिष्य की इच्छा शक्ति पुनः बनती है और लक्ष्य को पाने के ये फिर से शुण्य से महाशून्य मि यात्रा पर चल।पड़ता है
लेकिन संत कहते हैं —
“शून्य को पार करो, वहीं पूर्णता प्रकट होगी।”अब इस बात का ध्यान में आता है कि शून्य और महाशून्य में क्या अंतर है”।
यह बात सामान्यतः बहुत कम लोग समझते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि हम तोउस अनुभव के करीब पहुँच चुके हैं। जिसे हम
शून्य (Void – खालीपन की अनुभूति) कहते है
जब साधक ध्यान में गहराई तक जाता है तो एक अवस्था आती है जहाँ अनुभव होता है:
विचार लगभग समाप्त
संसार की पकड़ ढीली
अंदर गहरा खालीपन
इसे शून्य कहा जाता है।
इस अवस्था में अक्सर ये भाव आते हैं:
सब कुछ अस्थायी है
जीवन एक स्वप्न जैसा है
कुछ भी स्थायी नहीं
इसी अवस्था में कई साधकों के मन में यह प्रश्न उठता है:
“जब अंत में सब छोड़कर जाना है तो भजन-ध्यान किसलिए?”
यह अनुभव वैराग्य की गहराई का संकेत है, लेकिन अभी यात्रा बाकी होती है।
महाशून्य (Great Void – चेतन शांति)
जब साधक शून्य को भी पार कर जाता है तो महाशून्य का अनुभव होता है।
यहाँ अंतर बहुत सूक्ष्म है:
शून्य में खालीपन लगता है
महाशून्य में चेतन अनंतता महसूस होती है
यहाँ अनुभूति होती है:
गहरी शांति
असीम विस्तार
कोई अलग “मैं” नहीं
यहीं से ब्रह्म अनुभव या अद्वैत की झलक मिलती है।
शून्य और महाशून्य का सरल अंतर
शून्य
महाशून्य
खालीपन का अनुभव
चेतन अनंतता
वैराग्य अधिक
शांति और आनंद
कभी-कभी निरर्थकता महसूस
पूर्णता का अनुभव
यात्रा का मध्य
उच्च अवस्था का द्वार
संतों का संकेत
अनेक संत कहते हैं:
“शून्य से मत रुकना, शून्य के पार ही पूर्ण ब्रह्म है।”
इसलिए जब मन कहे सब बेकार है, तो समझना चाहिए कि साधना व्यर्थ नहीं हुई —
बल्कि साधक गहरे मोड़ पर पहुँच गया है।
अगर आप चाहें तो मैं आपको एक और बहुत सूक्ष्म बात बता सकता हूँ:
“ध्यान में जो सफेद बिंदु या प्रकाश दिखाई देता है, उसका आध्यात्मिक अर्थ क्या होता है।”
क्योंकि ये जिक्र पहले जो अनुभव बताया गया था उसमे कर चुका है (सफेद बिंदु और भारहीनता), वह व साधना की एक खास अवस्था से आत्मा के साथ गुरु कृपा से जुड़ा होता है।

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