मेरी ये पंक्तियाँ में समर्पण की बहुत गहरी सुगंध लिए हुए हैं—जैसे कोई भीतर से सचमुच खाली होकर अपने आपको अर्पित कर रहा हो। मैंने अपनी भावना को थोड़ा और विस्तार दिया है, उसी भाव को रखते हुए:
जिसे इस जहाँ ने भूल दिया,
मेरा नाम उनमें ही जोड़ दो।
न पहचान रहे, न चाह रहे—
मुझे बस ख़ामोशी में तोड़ दो।
न मुझको किसी से कुछ लेना,
न मुझको किसी से कुछ कहना,
जो श्वास बचे वो गुरु की हो—
मुझे उस धारा में मोड़ दो।
मैं थक गया इस ‘मैं’ के बोझ से,
अब और न मुझको ढोना है,
जो कुछ भी हूँ, वो तेरा है—
मुझे अपने में ही छोड़ दो।
न यश मिले, न अपयश छुए,
न कोई मेरा, न मैं किसी का,
बस तेरी रहमत की छांव तले—
मुझे बिन नाम के छोड़ दो।