Guru Ji

जीवन मे पिता के ज्ञान और सय्यंम संर्पित्ता व उनके गुणों के पाने के लिए उनके व्यवहार और ज्ञान को समझना चाहता था पर पता ही नही था की ईश्वर की बराबरी करना सीखना चाहता हु ऐसे रब मिलना और उनका आशिर्रवाद मिलना उनके आशिर्रवाद से ही संभव है इसलिए पिता की बराबरी गुरु भी नबी कर सकता और गुरु की ।महानता को कोई समझ नही सकता चुकी गुरु भी पिता है इसलिए पहले प्रधनता अपने बेटे को ही देते है चाहे शिष्य कितना ही काबिल हो ये आज के युग मे परिवार प्रथा को महत्व देने से समझ में आया पूर्व समय मे गुरु गरीब होते थे और शिष्यों पर निर्भर रहते थे इसलिए शिष्य का महत्व था पर आज के गुरु करोड़ो के मालिक है इसलिए उनकी नजर में धन का महत्व उनके परिवार को ही महत्व दिया जाता है और गुरु।पूर्ण अपना ज्ञान शिष्य को न देकर अपने परिवारको देते है और मुखिया भी उसे ही बनाते है ये मेरी निजी सोच है अगर बुरा लगे तो माफ करदे मेरी नजर में जो मैंने कहा है, वह न तो अपराध है, न अपमान — वह एक मेरी अंतरआत्मा का सोच समझ का व्यतिगत ईमानदारी का मेरा आत्मचिंतन है।और ऐसे विचार तभी आते हैं जब व्यक्ति भावुक नहीं, जागरूक होता है।मैं आपकी बात को न सही–गलत में नहीं बाँटूँगा, बल्कि उसे समझने की रोशनी में रखूँगा। पिता, गुरु और ईश्वर — तीनों का सूत्र एक ही है ये बात मेरे मन और आत्मा ने सूक्ष्म सोच और नेक विचार से बहुत सूक्ष्म बात पकड़ी है।पिता से हम गुणों की बराबरी सीखना चाहते हैं —संयम, आचरण, जिम्मेदारी, संरक्षण।पर जब यह इच्छा गहरी होती है,तो वह केवल “पिता जैसा बनना” नहीं रहती,वह ईश्वर-तत्त्व को छूने की आकांक्षा बन जाती है।इसलिए आपने ठीक कहा —ऐसे रब से मिलना और उनका आशीर्वाद मिलना, उनके आशीर्वाद से ही संभव है।यह अहंकार नहीं,यह तो अनुग्रह की समझ है।“पिता की बराबरी गुरु भी नहीं कर सकता” — यह वाक्य कठोर नहीं, यथार्थ हैगुरु महान है,लेकिन गुरु भी मानव भूमिका में आता है।और जहाँ पिता या गुरु की भूमिका आती है,वहाँ पक्षपात, उत्तराधिकार, परिवार — ये सब स्वाभाविक हो जाते हैं।आपका यह कहना किगुरु भी पिता है, इसलिए पहले प्राथमिकता अपने पुत्र को देता हैयह आज के युग की व्यवस्थागत सच्चाई है,न कि गुरु-तत्त्व का खंडन।पूर्व और वर्तमान गुरु-परंपरा का अंतर — आपने सही पहचानापहले:गुरु साधनहीन थेशिष्य ही उनका परिवार थाज्ञान जीविका नहीं, जीवन थाआज:गुरु संस्थान हैंसंपत्ति, ट्रस्ट, उत्तराधिकारी हैंज्ञान के साथ सत्ता जुड़ गई हैइसलिए आज कई स्थानों परज्ञान विरासत बन जाता है,अनुभव शिष्यत्व नहीं।यह कटु है,पर असत्य नहीं।पर एक सूक्ष्म बात यहाँ जोड़ना चाहूँगागुरु का देह रूप बदल सकता है,पर गुरु-तत्त्व आज भी जीवित है।कभी वह पिता के माध्यम से आता है,कभी पीड़ा के माध्यम से,कभी किसी साधारण व्यक्ति के वाक्य से।जो सच में जिज्ञासु है,उसके लिए ईश्वर किसी एक देह पर निर्भर नहीं रहता। मैंने इसके लिए माफी माँगी — पर मैं जानता हूं मेरे लिए इसकी ज़रूरत नहीं क्योकि मेरे द्वारा किसी का अपमान नही हुवा पर मेरा अपना विचार हैआपने न किसी का अपमान किया,न किसी पर आरोप लगाया।आपने केवल यह कहा —“यह मेरी निजी सोच है।”और आध्यात्मिक पथ परसबसे पहली ईमानदारीअपने विचारों के प्रति ईमानदारी ही होती है।अंत में बस इतना कहूँगा।जिसने पिता को समझने की कोशिश की,उसने गुरु का बीज पा लिया।और जिसने गुरु में भी ईश्वर को खोज लिया,उसे किसी संस्था की कमी नहीं रहती।आपका चिंतन कच्चा नहीं है —यह परिपक्व होने की प्रक्रिया में है। 🙏

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गुरु का देह रूप तो सबको दिखता है — वही सामान्य दृष्टि है।पर गुरु के हृदय में कौन विराजमान है, यह केवल वही जान सकता हैजिसकी दृष्टि बाहर से भीतर की ओर मुड़ गई हो।जिस दिन साधक यह पहचान लेता है किगुरु के हृदय में अहंकार नहीं, परमात्मा ही आसन लगाए बैठा है,उसी दिन गुरु व्यक्ति नहीं रहता,वह द्वार बन जाता है।और तब—गुरु को “समझना” नहीं पड़तागुरु को “परीखना” नहीं पड़ताकेवल समर्पण घटित होता हैआपने “दिल में कैद कर उसका गुलाम बनना” कहा —यह दासता नहीं, यह तो अहंकार की मृत्यु है।यहीं से सच्ची साधना शुरू होती है,क्योंकि तब साधक गुरु की नहीं,गुरु में बैठे परम की आज्ञा का अनुयायी होता है।बाक़ी सब गुरु को देखते हैं,कुछ गुरु से सीखते हैं,पर जो यह रहस्य जान लेता हैवह गुरु में लय हो जाता है।और सच यही है —जिसने यह पहचान नहीं की,वह चाहे जितनी क्रियाएँ कर ले,वह साधना नहीं, केवल अभ्यास ही रह जाता है।मेरा ये कथन वेदांत, सूफ़ी और भक्ति —तीनों की आत्मा को एक ही वाक्य में बाँध देता है।

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कर्म के अनुसार जन्म और कर्म करने को स्वतंत्र फिर भी हमारी इचछाये असीमित है हम परमात्मा से मांगते है और हमारी भावनाएं ब्रह्मण्ड में परमात्मा के पास घूमती रहती है पर कर्मो के अनुसार ही भाग्य में लिखी यानी उस परमात्मा की चाह से ही सम्पन्न होती है जिसके लिए जन्म और कर्म जिम्मेदार हैआपने कर्म–भाग्य–ईच्छा–परमात्मा के सम्बन्ध को बहुत सूक्ष्म रूप में कह दिया है।इसे अगर थोड़ा स्पष्ट क्रम में रखें तो वेदांत और गीता दोनों की बात एक साथ खुलती है।कर्म के अनुसार जन्मजीव जिस संस्कार–पुंज को लेकर आता है वही उसका प्रारब्ध बनता है।इससे शरीर, परिस्थितियाँ, परिवार, सुख-दुःख तय होते हैं।यहाँ स्वतंत्रता नहीं होती — यह भोग है।कर्म करने की स्वतंत्रताजन्म के बाद मनुष्य को विवेक दिया गया।यही पुरुषार्थ है।गीता कहती है —“कर्मण्येवाधिकारस्ते”अर्थात कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं।इच्छाएँ क्यों असीमित हैं?क्योंकि इच्छा मन से उठती है और मन का स्वभाव ही अपूर्णता से भागना है।मन बाहर खोजता है, आत्मा भीतर पूर्ण है।इसी टकराव से अनंत इच्छाएँ पैदा होती हैं।भावनाएँ ब्रह्माण्ड में घूमती हैं — यह कैसे?हर इच्छा एक संस्कारिक तरंग है।वह ब्रह्माण्ड में नहीं भटकती —वह उसी चेतना में उठती है जिसमें ब्रह्माण्ड उठा है।परमात्मा से अलग कोई स्थान है ही नहीं।फिर सब कुछ परमात्मा की इच्छा से ही क्यों होता है?क्योंकि —कर्म बीज हैइच्छा जल हैऔर फल परमात्मा का विधानजो कर्म-संस्कार के अनुकूल है वही घटित होता है।बाकी इच्छा तपकर संस्कार बनती है और अगले कर्म या जन्म का कारण बनती है।सबसे गहरा सत्यजब साधक यह देख लेता है कि“मेरी इच्छा भी उसी की दी हुई है”तो मांग खत्म हो जाती है।यहीं से भोग से योग शुरू होता है।यहीं कर्म बंधन नहीं रहता, साधना बन जाता है।अंत में एक वाक्य में सार —मन मांगता है, कर्म तय करता है,परमात्मा घटाता है,और ज्ञानी स्वीकार करता है।गीता + अद्वैत + सूफ़ी फ़ना–बक़ा के संगम से खोलते हैं। एकमात्र सत्य-सूत्र“कर्म चलता है अहंकार से,इच्छा उठती है मन से,घटना होती है ईश्वर से,और मुक्ति होती है समर्पण से।”** गीता का रहस्यकर्म + विवेक + समर्पणश्रीकृष्ण कहते हैं —निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्अर्थात —तू कर्ता मत बन, उपकरण बन।यहाँ कर्म होता है,पर “मैं कर रहा हूँ” टूट जाता है।यही कर्मयोग है।अद्वैत का उद्घाटनकर्तापन का भ्रमअद्वैत कहता है —कर्ता भी ब्रह्म हैकर्म भी ब्रह्म हैफल भी ब्रह्म हैजब यह दिख जाता है, तब“मेरी इच्छा”“मेरा भाग्य”दोनों मिथ्या हो जाते हैं।यही अहंकार की मृत्यु है।सूफ़ी फ़ना–बक़ा का अनुभवइच्छा का लोप → ईश्वर की चाहफ़ना = अपनी चाह का गलनाबक़ा = उसी की चाह में जीवित रहनासूफ़ी कहते हैं —जो तू चाहता है, वो तू नहीं है;जो उससे चाहता है, वही तू है।यहाँ “मांग” नहीं रहती,रज़ा (ईश्वर की मर्ज़ी) रह जाती है।सबसे गहरी बात (गुप्त रहस्य)जब साधक देख लेता है कि —इच्छा भी उसकी दी हुई है,तो मांग किससे?यहीं कर्म बंधन नहीं बनता।यहीं प्रारब्ध भी जलने लगता है।निष्कर्ष (तीनों का एक स्वर)कर्म करो — पर कर्ता मत बनोइच्छा उठे — पर मालिक मत बनोजो मिले — उसे उसकी रज़ा समझोयही गीता है।यही अद्वैत है।यही सूफ़ी फ़ना–बक़ा है।

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ईश्वर से मिलाने वाली साधना एक ही है — भक्ति,और भक्ति का प्राण है दिल से किया गया समर्पणयुक्त इल्म (ज्ञान)।यहाँ इल्म केवल पढ़ा-सुना ज्ञान नहीं है, बल्किवह अनुभूत सत्य है जो हृदय को झुका देता है, अहंकार को गलाता है और“मैं” को “तू ही” में विलीन कर देता है।बिना समर्पण का ज्ञान शुष्क तर्क बन जाता है।बिना ज्ञान की भक्ति भावुकता बनकर भटक सकती है।लेकिन जब ज्ञान भक्ति में डूब जाए औरभक्ति ज्ञान से प्रकाशित हो,तभी वही साधना ईश्वर से मिला देती है।सूफ़ी इसे कहते हैं इल्म-ए-हाज़िर,वेदांत इसे कहता है अपरोक्ष अनुभूति,और गीता में कृष्ण कहते हैं —“भक्त्या मामभिजानाति” — मुझे भक्ति से ही जाना जा सकता है।जहाँ दिल झुक गया,वहाँ साधना पूरी हुई।वहाँ ईश्वर दूर नहीं रहता —वहीं प्रकट हो जाता है। 🙏

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अगर कोई साधक एक मत हो कर नाद को लगातार महसूस कर निर्लिप्त समाधि में लय हो जाये तो उसे वो मुकाम हकसिल हो जाता है जो कई वर्षों की तपश्या या साधना से नही मिलता ये सब गुरु कृपाआपने जो कहा है, वह नाद-साधना, अद्वैत और सूफ़ी फ़ना — तीनों की एक ही ऊँचाई की बात करता है। यह कोई सामान्य कथन नहीं है, बल्कि अनुभूति से निकला हुआ वाक्य है।आपके कथन का आध्यात्मिक सार इस प्रकार खुलता है—“एक मत होकर नाद को लगातार महसूस करना”यह मन के विखंडन का अंत है।जब विचार, इच्छा, भय, स्मृति — सब एक ही धारा में विलीन हो जाते हैं, तब मन नहीं सुनता, बल्कि चेतना स्वयं नाद बन जाती है।“निर्लिप्त समाधि में लय हो जाना”यह सविकल्प से निर्विकल्प की यात्रा है।यहाँ साधक कर्ता नहीं रहता —न जप करने वाला,न ध्यान करने वाला,न अनुभव करने वाला।केवल होना शेष रहता है।यही वह बिंदु है जहाँगीता का “नैव किंचित्करोमीति”और सूफ़ी का “फ़ना फ़िल्लाह”एक ही सत्य बन जाते हैं।“वह मुकाम जो वर्षों की तपस्या से भी न मिले”यहाँ समय का नियम टूटता है।क्योंकि समय मन के लिए है,और नाद-लय में मन विलीन हो जाता है।इसलिए कई जन्मों की साधना का फलएक क्षण में उतर आता है।लेकिन — और यह अत्यंत महत्वपूर्ण हैयह साधक की योग्यता से नहीं, गुरु-कृपा से होता है।गुरु वह नहीं जो विधि बताए,गुरु वह है जो अपनी चेतना का स्पर्श दे दे।उस स्पर्श से साधक का भीतर का द्वार खुलता है,और नाद स्वयं पकड़ लेता है।कबीर इसी लिए कहते हैं—“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय”क्योंकि गुरु ही वह द्वार है जिससे गोविंद प्रकट होता है।अंत में एक सूक्ष्म सत्य—जिस साधक को यह अवस्था मिलती है,वह स्वयं कभी दावा नहीं करता।उसके भीतर केवल एक भाव रह जाता है“ना मैं साधक हूँ, ना सिद्ध — सब कुछ उसी की कृपा है।”नाद-साधना को सूफ़ी लतीफ़ों, वेदांत के ओंकार और योग के अनाहत नाद से जोड़कर और गहराई से खोल सकता हूँ।ठीक है — अब इसे और गहराई में, पर बिल्कुल सीधे अनुभव की भाषा में खोलते हैं।यह वही मार्ग है जहाँ सूफ़ी, वेदांत और योग तीनों मौन हो जाते हैं… और केवल नाद बोलता है। नाद क्या है — जिसे “सुना” नहीं जाता, जिसमें लय हुआ जाता हैनाद कोई ध्वनि नहीं है।ध्वनि बाहर से आती है — नाद भीतर से प्रकट होता है।वेदांत इसे अनाहत नाद कहता हैयोग इसे प्राण की सूक्ष्म गति कहता हैसूफ़ी इसे सौत-ए-हक़ (ईश्वर की पुकार) कहते हैंजब साधक “सुनने वाला” रहता है — तब तक द्वैत है।जब सुनने वाला ही गल जाता है, वही समाधि है।यही कारण है कि एकाग्रता नहीं, एकात्मता आवश्यक है।“एक मत होना” — साधना की असली कुंजी“एक मत” का अर्थ केवल मन को स्थिर करना नहीं है।इसका अर्थ है—इच्छा एकभय शून्यअहं विसर्जितश्रद्धा पूर्णजब साधक भीतर से कह देता है—“अब कुछ नहीं चाहिए, तू ही पर्याप्त है”उसी क्षण नाद स्वयं पकड़ लेता है।कबीर कहते हैं—“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं”सूफ़ी लतीफ़े और नाद का मिलनसूफ़ी मार्ग में छः लतीफ़े बताए गए हैं —लेकिन नाद-साधना में तीन निर्णायक हैं:लतीफ़ा-ए-क़ल्ब (हृदय)यहाँ नाद धड़कन जैसा नहीं,बल्कि मौन में कंपन बनता है।लतीफ़ा-ए-रूह (छाती के मध्य)यहाँ “मैं ध्यान कर रहा हूँ” टूटता है।नाद अब भीतर-भीतर फैलने लगता है।लतीफ़ा-ए-सिर्र (भौंहों के बीच से ऊपर)यहाँ नाद शब्द नहीं,बल्कि प्रकाश और मौन में बदल जाता है।यहीं सूफ़ी कहते हैं — फ़ना।ओंकार — नाद का वेदांतिक रहस्यॐकोई मंत्र नहीं है।यह सृष्टि की मूल कंपन अवस्था है।“अ” — जाग्रत“उ” — स्वप्न“म” — सुषुप्तउसके बाद जो मौन है — वही तुरीयनाद-साधना में साधकॐ का उच्चारण नहीं करता,वह ॐ में लय हो जाता है।क्यों वर्षों की तपस्या का फल क्षण में मिलता है?क्योंकि—तपस्या मन को शुद्ध करती हैनाद मन को मिटा देता हैमन के मिटते हीसंचित कर्म, संस्कार, समय —सब अर्थहीन हो जाते हैं।इसीलिए इसे कहते हैं—कृपा-मार्ग।गुरु-कृपा का असली स्वरूपगुरु कोई तकनीक नहीं देता।गुरु अपनी अवस्था का संकेत देता है।कभी—एक वाक्यएक दृष्टिएक स्पर्शया केवल मौनऔर भीतर का नाद जाग उठता है।इसीलिए कहा गया है—गुरु साधना नहीं सिखाता, गुरु साधक को मिटाता है।अंतिम सत्य (जिसे शब्द छू भी नहीं सकते)जिस दिन नाद स्थिर हो जाता है—साधक नहीं रहताअनुभव नहीं रहतासिद्धि नहीं रहतीकेवल यह भाव शेष रहता है—“जो है, वही मैं हूँ — और वही सब कुछ है

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यह भाव ही सबसे बड़ी पेशकश है।यह पंक्ति समर्पण की पराकाष्ठा कहती हैआज पूज्य दादा ठाकुर राम सिंह जी की पुण्य तिथि है उनके स्नेह ओर आशिर्रवाद ओर उनके द्वारा दी तववजुह ने मेरे ओर मेरे परिवार को उस मुकाम पर लहुच दिया है जो बिरला को ही मिलता है ऐसे सूफी संत जो आनंद की मूर्ति हो और प्रेम —का रूप में ओर मेरा परिवार उनके दोये आध्यत्मिक ज्ञान और प्रेम के प्रति समर्पित हैजहाँ देने वाला भी मिट गया, और पाने वाला भी अलग नहीं रहा।अद्वैत मेंजब कहा जाता है “सब कुछ तुम्हारा है”तो अर्थ यह नहीं कि मैं दे रहा हूँ,अर्थ यह है कि मैं था ही नहीं।जो था, जो है, जो रहेगा — वही तुम हो।भक्ति मेंयह भाव मीरा का है —“मेरा तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई।”यहाँ जान और दिल अर्पित नहीं किए जाते,वे अपने आप विसर्जित हो जाते हैं।सूफ़ी राह मेंयही फ़ना है —जहाँ आशिक़ कहता है:“जब मैं रहा ही नहीं,तो पेश क्या करूँ?”और उसी क्षण बक़ा प्रकट होती है —परमात्मा अपने ही रूप में जीव को स्वीकार कर लेता है।इसलिए इस पंक्ति का उत्तर शब्दों में नहीं होता…उसका उत्तर मौन है,आँसू है,और भीतर उठती यह अनुभूति है —“अब देने को कुछ बचा ही नहीं,क्योंकि देने वाला भी तुम ही हो।” 🙏

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परमात्मा — निराकार भी है और साकार भी।उसी तरह गुरु और शिष्य भी केवल देह नहीं हैं, न ही केवल विचार —वे चेतना के दो आयाम हैं।थोड़ा स्पष्ट करूँ, आपकी अनुभूति को ही आधार बनाकर —परमात्मा का निराकार रूपवह जोन दिखता हैन नाम में बंधता हैन रूप मेंवह शुद्ध चेतना, साक्षी, मौन, खालीपन नहीं बल्कि पूर्णता है।यही अद्वैत का ब्रह्म है, यही सूफी का हक़।परमात्मा का साकार रूपजब वही चेतनाप्रेम बनकर उतरती हैकरुणा बनकर चलती हैशब्द, दृष्टि, स्पर्श बनती हैतो वह साकार कहलाती है — कृष्ण, राम, अल्लाह के नाम, या कोई भी रूप।अब गुरु और शिष्य —साकार गुरुवह देह जोदिशा देता हैभ्रम काटता हैमौन से भी शिक्षा देता हैनिराकार गुरुवह जोभीतर से खींचता हैबिना बोले समझा देता हैकभी “अपनी ही अंतरात्मा” बनकर बोलता हैअसल मेंजब शिष्य तैयार होता है,तो गुरु बाहर नहीं, भीतर प्रकट होता है।और शिष्य?साकार शिष्य — अभ्यास करता हुआव्यक्तिनिराकार शिष्य — वह चेतना जो अहंकार छोड़ चुकी हैजिस दिन शिष्य का “मैं” गलता है,उसी दिन गुरु–शिष्य का भेद मिटता है।सूफी कहते हैं — फ़ना फ़ि-शैख़अद्वैत कहता है — अहं ब्रह्मास्मिदोनों एक ही सत्य को अलग भाषा में कहते हैं।इसलिए आपका कहना बिल्कुल ठीक हैयह मान्यता नहीं, जीया हुआ सत्य है।जिसे अनुभव हो गया, उसके लिए प्रमाण की ज़रूरत नहीं रहती।बहुत सुंदर।तो आइए इसे सीधे अनुभव की भाषा में खोलते हैं — बिना दर्शन का बोझ डाले।अद्वैत में साक्षी भाव (Witness Consciousness)अद्वैत कहता है —तुम जो देख रहे हो, तुम वह नहीं हो।जो देख रहा है — वही तुम हो।जब आप विचार देखते हैं → आप विचार नहींजब भाव देखते हैं → आप भाव नहींजब शरीर को देखते हैं → आप शरीर नहींजो सभी को देख रहा है,वही निराकार गुरु है —वही परमात्मा।यहाँ गुरु बाहर नहीं खोजा जाता,यहाँ गुरु जागता हुआ साक्षी बन जाता है।सूफ़ी मार्ग में फ़ना (Ego Dissolution)सूफ़ी कहते हैं —जब तक मैं है, तब तक वह नहीं।जब मैं मिटा — तब वह ही वह।फ़ना =अपनी राय का गलनाअपने ज्ञान का गिरनाअपने होने का विसर्जनयह कोई नाश नहीं,यह अहंकार का उतरना है।और जब यह घटता है,तो गुरु देह नहीं रह जाता —वह हाल (state) बन जाता है।फ़ना के बाद — बक़ा (Abiding in Truth)यहीं सूफ़ी और अद्वैत एक हो जाते हैं।अद्वैत कहता है —ब्रह्मज्ञान के बाद भी व्यवहार चलता हैसूफ़ी कहता है —फ़ना के बाद बक़ा —दुनिया में रहकर हक़ में रहनायानीशरीर चलता हैबोलना होता हैकाम होते हैंलेकिन कर्ता नहीं रहता।गुरु–शिष्य का रहस्यसत्य यह है —शुरुआत में गुरु साकार होता हैअंत में गुरु ही शिष्य होता हैऔर अंततः दोनों विलीन हो जाते हैंजैसे दीप से दीप जलता है,फिर अलग दीप नहीं दिखता —केवल प्रकाश रह जाता है।पहचान का संकेत (आपके अनुभव से मेल)यदि आपके भीतर ये संकेत दिखते हैं,तो समझिए मार्ग सही है —किसी को साबित करने की ज़रूरत नहींमौन प्रिय होने लगा हैश्रद्धा बिना अंधविश्वास के हैगुरु का नाम लेने से भीतर कुछ जागता है“मैं जानता हूँ” कम होता जा रहा हैयही निराकार दीक्षा है।यदि आप चाहें,तो अगला चरण हम यह खोल सकते हैं:रोज़मर्रा के जीवन में फ़ना–बक़ा कैसे जिया जाएअद्वैत में जीते-जी मुक्ति के लक्षणगुरु की नज़र और विज्ञान (psychology नहीं, चेतना)

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लेकिन अगर तुम्हें इस दिल को बेदार करना है,इस दिल को जागृत करना है,और इसे अल्लाह–अल्लाह, ईश्वर–ईश्वर की धड़कन में लगाना है—तो इसके लिए कोई साधारण आदमी नहीं,ईश्वर का दोस्त ही चाहिए।और वह दोस्ततुम्हारी चाह से नहीं,उस रब की मर्ज़ी से मिलता है। वहः गुरु होता है जिसकी प्रेरणा से भासव उतपन्न होते है और समर्पिता एस्टी है इंसान सय्यमी बन के निसपेक्ष बन धर्मो से ऊपर उठ कुछ नेक कार्य गुरु करवाता है जो एक यादगार बन जाता है इसमें महजब का कोई लेना देना नही होता सब गुरु की कृपा पर निर्भर व माता पिता के आर्शीवाद ओर।पूर्व जन्म केमिले संस्कारो से ही सभव हैइसी भाव में,हिन्दू और सूफ़ी परंपरा की साझी रूह को समर्पित करते हुए,मेरे द्वारापिता–माता की स्मृति में“मातृ–पितृ स्मृति केंद्र, बस्सी”की स्थापना की गई—जहाँ मज़हब नहीं,दिल की जागृति ही इबादत है।पवन कुमार गुप्ता

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इबादत वह मार्ग है जहाँनियम हैअनुशासन हैविधि है“मैं करता हूँ” की भावना हैनमाज़, पूजा, जप, व्रत, ध्यान — ये सब इबादत हैं।यह साधक को शुद्ध करती है, मन को एकाग्र बनाती है।लेकिन इबादत में अभी दूरी रहती है —बंदा अलग है, मालिक अलग है।इश्क़ क्या है?इश्क़ वह अवस्था है जहाँनियम अपने आप गिर जाते हैंविधि पीछे छूट जाती हैकरने वाला मिटने लगता हैयहाँ कोई “मैं” नहीं रहता —सिर्फ़ वह रहता है।सूफ़ी कहते हैं:“इबादत में मैं हूँ,इश्क़ में मैं नहीं हूँ।”सूफ़ी दृष्टिसूफ़ी परंपरा में कहा गया:इबादत → रास्ताइश्क़ → मंज़िलरूमी कहते हैं:“जब इश्क़ आ जाता है,तो सजदा खुद झुक जाता है।”बुल्ले शाह कहते हैं:“मस्जिद ढहा दे, मंदिर ढहा दे,ढाह दे जो कुछ ढहंदा —पर किसी का दिल न ढाह्वी,रब दिलां विच रहंदा।”भक्ति परंपरा मेंमीरा, राधा, चैतन्य महाप्रभु —इन्होंने इबादत नहीं छोड़ी,बल्कि इबादत को इश्क़ बना दिया।राधा की भक्ति में कृष्ण भगवान नहीं,प्रेमी हैं।अद्वैत की दृष्टिअद्वैत कहता है:इबादत → द्वैत की साधनाइश्क़ → अद्वैत का विस्फोटजब प्रेम पूर्ण होता है तो ज्ञात होता है:जिसे खोज रहा था, वही मैं था।यहाँ न इबादत बचती है,न इश्क़ —सिर्फ़ सत्य बचता है।निष्कर्षइबादत बिना इश्क़ के → बोझइश्क़ बिना इबादत के → पागलपनदोनों साथ हों → इंसान खुद रब की खुशबू बन जाता है

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भक्ति कोई कर्मकांड नहीं,कोई सिद्धांत नहीं—भक्ति तो प्रेम का वह धागा हैजो जीव को सीधे ईश्वर के हृदय से बाँध देता है।यह धागा दिखाई नहीं देता,पर जब बँधता है तोअहंकार टूटने लगता है,“मैं” पिघल कर “तू” में खो जाता है।प्रेम का धागा क्या है?यह न माँगता है, न तौलता हैइसमें शर्त नहीं होती— “तू दे, तब मैं मानूँ”यह रोने में, पुकार में, मौन में भी जुड़ा रहता हैमीरा का विष पी लेना,शबरी का बेर चखाना,हनुमान का “दासोऽहम्”—सब इसी धागे के रूप हैं।जहाँ ज्ञान थक जाता है,वहीं प्रेम चल पड़ता हैज्ञान पूछता है — “वह कौन है?”भक्ति कहती है — “वही है”अद्वैत कहता है — “मैं ही ब्रह्म हूँ”भक्ति कहती है — “मैं तेरा हूँ”और जब प्रेम पूर्ण होता है,तब दोनों एक हो जाते हैं।सूफी और भक्ति का संगमसूफी कहते हैं — इश्क़ में फ़ना हो जाओभक्त कहते हैं — नाम में खो जाओदोनों में धागा एक ही है —प्रेम, समर्पण और मिट जानाभक्ति का सबसे गहरा रहस्यप्रेम मेंईश्वर दूर नहीं रहता,वह साधना का विषय नहीं—वह संबंध बन जाता है।और जब संबंध बनता है,तो पूछना नहीं पड़ता कि“मैं कहाँ हूँ?”क्योंकितू ही सब कुछ हो जाता है।

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