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ध्यात्म में प्रेम सर्वोच्च स्थान रखता है, और इसके नीचे भक्ति, ज्ञान, ध्यान तथा भजन आते हैं। प्रेम ही भक्ति का मूल आधार है, जो हृदय को परमात्मा से जोड़ता है। बिना प्रेम के न ज्ञान संभव है, न सच्ची भक्ति।प्रेम की प्रधानताप्रेम अध्यात्म का प्रथम सोपान है, जो अहंकार को भंग कर आत्मा को जागृत करता है। यह द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है, जहाँ जीव अपने समर्पण से परम सत्य में विलीन हो जाता है। भक्ति प्रेम का ही रूप है, जिसमें भजन-कीर्तन जैसी विधियाँ सहायक होती हैं।भक्ति-ज्ञान का संबंधभक्ति प्रेम से प्रारंभ होकर ज्ञान की ओर अग्रसर होती है, किंतु ज्ञान बिना प्रेम के शुष्क रहता है। ध्यान ज्ञान का फल है, जो अंतर्मुख जिज्ञासा से उत्पन्न होता है। भजन भक्ति की साधना है, जो प्रेम को गहन बनाती है।साधना क्रमप्रेम: आधार, समर्पण का प्रारंभ।भक्ति: प्रेम की अभिव्यक्ति, भजन-कीर्तन से।ज्ञान: जिज्ञासा से, द्वैत का अतिक्रमण।ध्यान: एकाग्रता, आत्म-साक्षात्कार

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सूफी साधना में बका: अहंकार से परे शाश्वत चेतना की यात्रा

बका सूफी दर्शन में फना के बाद की परम अवस्था है, जहाँ अनुभव शाश्वत एकता और दिव्य गुणों से भरपूर होते हैं।अनुभवों के चरित्रशाश्वत...

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नया साल, नई चेतना: आत्म-साक्षात्कार और दिव्य प्रेम की शुभकामनाएं

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं! इस नए वर्ष में आध्यात्मिक जागरण और आत्म-साक्षात्कार की नई यात्रा प्रारंभ हो।आध्यात्मिक शुभकामना संदेशयह संदेश भगवद्गीता की प्रेरणा...

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