November 26, 2025 विभिन्न धर्मों में “मरने से पहले मरना” का अर्थ भले ही थोड़ा अलग हो, लेकिन पिताजी का आध्यात्मिक साधना में इसका मूल अर्थ व उनके भाव एक ही है: सांसारिक अहंकार, मोह, और नश्वरता को छोड़कर आध्यात्मिक जागृति या मुक्ति प्राप्त करना।बौद्ध धर्म में इसका मतलब है अपनी मृत्यु का सामना करना, यानी नश्वरता को स्वीकार कर अहंकार से मुक्त हो जाना, जो मृत्यु का केवल भौतिक अंत नहीं बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक जागृति है। यह स्थिति भय से ऊपर उठने की होती है, जहां मन शांति और संतोष में रहता है।हिंदू धर्म में यह विचार मोक्ष या मुक्त होने से जुड़ा है, जहां सांसारिक बंधनों, इच्छाओं, और अहंकार को मरने से पहले छोड़ कर आत्मा की शाश्वत चेतना के साथ एकात्मता प्राप्त होती है। गरुड़ पुराण और अन्य शास्त्र मृत्युपूर्व के संकेतों और कर्म चक्र के अंत की ओर ध्यान दिलाते हैं।सूफी और अन्य ध्यानात्मक रास्तों में “मरने से पहले मरना” का मतलब भी सांसारिक मोह-माया से दिव्य प्रेम और परम सत्य के प्रति जागरूक होना है।ईसाइयत में भी मृत्यु पूर्व पापों की शुद्धि और आत्मा की शांति की अवधारणा मिलती है, जो पुनर्जन्म से परे स्वर्ग की ओर यात्रा की तैयारी मानी जाती है।इस प्रकार, सभी धर्मों में “मरने से पहले मरना” का अभिप्राय सांसारिक जीवन और अहंकार के बंधनों को छोड़ कर एक आध्यात्मिक जागरूकता, शांति, और मुक्ति की अवस्था में प्रवेश करना है। यह केवल शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि मन, चेतना और भावना का एक नया जन्म है, जो मृत्यु के बाद भी अनश्वर रहता है Read More
November 26, 2025 अध्यात्म में तरीकत की सर्वोच्च अवस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने अहंकार और निचले स्वभाव से पूरी तरवह ऊपर उठकर ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है। इसे योग-ध्यान की परम अवस्था भी कहा जाता है, जहां ध्यान की गहराई में मन पूरी तरह शांत और निर्विकल्प हो जाता है, और आत्मा ब्रह्म के साथ एक स्वरूप हो जाती है। इस अवस्था को तूरिया या परम जागरण कहा जाता है, जहाँ शुद्ध आनंद और ईश्वर का अनुभव होता है।तरीकत का शाहराग अर्थात सर्वोच्च रंग या गुण वह है जो इस मार्ग पर चलने वाले साधक के भीतर विकसित होता है। यह गुरु कृपा द्वारा मुराद और माशूक सिफ़तों का अवतरण होता है, जिसमें साधक का स्वभाव बदलता है और वह ईश्वर के प्रति समर्पित, प्रेमी और स्वच्छता वाला बनता है। इस मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति गुरु की सोहबत और निर्देश बड़ा महत्व देता है, जिससे उसकी आत्मा की शुद्धि और उन्नति होती है।तरीकत को शरीयत, हकीकत और मारिफ़त के क्रम के बाद आता माना गया है, जिसमें शरीयत बाहरी कर्मकांड और नियमों का पालन है, तरीकत आत्मशुद्धि और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का मार्ग है, तथा हकीकत और मारिफ़त में ईश्वरीय ज्ञान और अनुभूति होती है। तरीकत की सर्वोच्च अवस्था वह है जब साधक अपने अंदर के अहंकार को छोड़, पूर्ण समर्पण के साथ ईश्वर में लीन हो जाता है।संक्षेप में:तरीकत की सर्वोच्च अवस्था: तूरिया या परम जागरण, निर्विकल्प ध्यान की स्थिति जिसमें आत्मा ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाती है।शाहराग: साधक में मुराद और माशूक सिफ़तों का विकास, गुरु कृपा द्वारा ईश्वर प्रेम और भक्ति का रूप।यह अवस्था गुरु की मार्गदर्शन और कृपा से संभव होती है और शरीयत, हकीकत, मारिफ़त के बाद का अध्यात्मिक स्तर है।यह ज्ञान योग, सूफी और संत परंपराओं में पारंपरिक रूप से पाया जाता है और ध्यान व साधना के माध्यम से प्राप्त होता हैतरीकत में शाहराग तक पहुंचने के व्यावहारिक उपाय मुख्य रूप से गुरु की सोहबत, निरंतर ध्यान और रूहानी अभ्यास, तथा मनोवृत्तियों की निर्मलता पर निर्भर करते हैं। साधक को सबसे पहले अपने मन और आत्मा को अशुद्धिकरण और बुरे स्वभाव से मुक्त करना होता है। इसके लिए नियमित सुमिरन, ज़िक्र (ईश्वर का नाम जप), और ध्यान की अनिवार्य आवश्यकता होती है जिससे मन की पतित वृत्तियां दूर हों और आत्मा की शुद्धि हो।दूसरा मुख्य उपाय है गुरु की कृपा और मार्गदर्शन के अंतर्गत रहना। गुरु साधक को सही तरीकत के अभ्यास, नवाज़, बन्दगी, और परहेज सिखाते हैं। साधक को आत्मसंयम, तपस्या, और इमानदारी के साथ शारीरिक, मौखिक और मानसिक नियंत्रण करना होता है। यह अभ्यास धीरे-धीरे शाहराग (आत्मिक रंग या प्रेम) उत्पन्न करता है जो ईश्वर के साथ गहरा जुड़ाव दिखाता है।तीसरा उपाय है इन्साफ और रहनुमाई की सहायता, जिसमें साधक अपने मन के विकारों का निरीक्षण करे और उन्हें दूर करने के लिए ध्यान, जागरूकता, और सही क्रियाओं का सहारा ले। यह रास्ता धीरे-धीरे हकीकत की ओर ले जाता है, जहाँ प्रेम, शुद्ध भावना, और ईश्वर के प्रकाश में निवास संभव होता है।संक्षेप में:गुरु की सोहबत और उनके बताए मार्ग का पालननियमित ध्यान, सुमिरन और नाम जपमन और आत्मा की शुद्धि के लिए संयम, तपस्या और आत्मनिरीक्षणविकारों का त्याग और ईश्वर से पूर्ण समर्पणये उपाय तरीकत के शाहराग की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं, जो अंततः साधक को परमात्मा के निकट ले जाते हैं और आध्यात्मिक उन्नति करते हैं Read More
November 25, 2025 भाई आपने इतने कम शब्दों में नाद का वास्तविक अर्थ लिख दिया और अपने अनुभव से हमे वहः ज्ञान समझाया इसके लिए धन्येवादगुरु या ईश्वर की याद दिलाने वाला वह स्पर्श, कंपन या ख्याल जिसे हम वास्तविक नाद कह सकते हैं, उसे वेदों और उपनिषदों में अनाहत नाद (Anahad Naad) कहा गया है। यह अनाहत नाद वह ध्वनि है जो बिना किसी आघात या उत्प्रेरण के उत्पन्न होती है, अर्थात यह प्राकृतिक, आंतरिक और दिव्य स्वरूप की ध्वनि है। यह नाद वह अमूर्त ऊर्जा और चैतन्य का संचार करता है जो सीधे हृदय केन्द्र (अनाहत चक्र) से जुड़ा होता है और जो साधक के मन को गुरु या परमात्मा की स्मृति में ले जाता है .नादयोग में यह माना जाता है कि जब साधक ध्यानपूर्वक सांस वाचक और मानसिक शक्तियों को नियंत्रित करता है, तब बाहरी ध्वनियों से मन शांति प्राप्त कर अंदर के अनाहत नाद (भीतरी कंपन/ध्वनि) को सुनने के योग्य बन जाता है। वही आंतरिक ध्वनि साधक को ईश्वर का अनुभव कराती है, जिससे मन और हृदय एकाग्र होकर आध्यात्मिक जागरण की ओर बढ़ते हैं। इस आंतरिक नाद की अनुभूति गुरु की ऊर्जा के संप्रेषण (शक्तिपात) द्वारा और भी सशक्त हो सकती है जो शिष्य के अंदर दिव्यता, शान्ति और स्नेह की अनुभूति जगाती है .गुरु स्मरण और भगवान की याद को जागृत करने वाला वह कोई भी ख्याल, स्पर्श, या कंपन जब मन को मोह-माया से ऊपर उठाकर सत्स्वरूप अनंत चेतना में ले जाता है, तब उसे सच्चा नाद कहा जा सकता है। यह नाद न केवल शब्द या ध्वनि से परे है, बल्कि एक आंतरिक ऊर्जा-तरंग है जो चेतना को आलोकित करती है और भक्ति, समर्पण, और मोक्ष की ओर ले जाती है .इसलिए इस सच्चे नाद का नाम कुछ भी हो—अनाहत नाद, शाब्द ब्रह्म, या गुरु-उर्जा का संचार—मूलतः यह वह दिव्य कंपन है जो साधक के हृदय में गुरु या ईश्वर की उपस्थिति का भाव जागृत करता है, जिसके द्वारा साधना सफल होती है और आत्मा का उत्कर्ष होता है। Read More
November 24, 2025 नाद ब्रह्म और ओम में मुख्य अंतर इस प्रकार है:अर्थ और स्वरूप:नाद ब्रह्म वह अनाहत (अघोषित) दिव्य ध्वनि है जो ब्रह्माण्ड के सर्वत्र व्याप्त और निरंतर चल रही है। यह शिव संहिता और योग शास्त्रों में परम चेतना की स्वरूप ध्वनि के रूप में वर्णित है। इसे ध्यान साधना में सूक्ष्म चेतना की ध्वनि भी माना जाता है।ओम एक विशिष्ट मंत्र है, जो नाद ब्रह्म की एक अभिव्यक्ति और स्वरूप है। यह तीन अक्षरों (अ, उ, म) का योग है, जो ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिरता और लय का प्रतीक है। यह सर्वविदित बीज मंत्र है जिसका उच्चारण साधना और ध्यान का माध्यम होता है।उपस्थिति और अनुभव:नाद ब्रह्म की आवाज़ एक अतींद्रिय, निराकार और निरंतर गूंजती हुई ऊर्जा ध्वनि है, जो साधक के आंतरिक अनुभव के आधार पर सुनी और अनुभूत की जा सकती है। यह बाह्य ध्वनि नहीं, बल्कि अंतःकरण से अनुभवित होती है।ओम का उच्चारण एक बाह्य और आंतरिक दोनों प्रक्रिया है, जिससे शरीर और मन में सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होते हैं, और यह ध्यान को केंद्रित करता है। ओम की ध्वनि ब्रह्म के परम सत्य का नाम है।साधना और महत्व:नाद ब्रह्म को अधितम योग एवं नादयोग में अनुभवित और साधित किया जाता है, जो आत्मा के परम स्वरूप से जुड़ने का मार्ग है।ओम का जाप सभी धर्म सूत्रों में प्रमुख है, जो साधा-साध्य का सेतु है और ध्यान एवं मंत्र साधना की आधारशिला भी है।संक्षेप में, नाद ब्रह्म वह मूल, निराकार दिव्य ध्वनि है जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, जबकि ओम उसी नाद ब्रह्म की सर्वमान्य भावध्वनि और संस्कृत बीज मंत्र है, जो साधना द्वारा उच्चतम सत्य की अनुभूति कराता है। दोनों में नाद ब्रह्म व्यापक और अनाहत नाद है, ओम उसका स्वरूप और साधना का माध्यम है Read More
November 24, 2025 स्वयं के ऐक्य और ब्रह्मानुभूति के लक्षण इस प्रकार होते हैं:द्वेष, क्रोध, मोह, भय, सुख-दुख की परवाह समाप्त हो जाती है। साधक में समदृष्टि, समदुःखसुखता आती है, जो जीवन के द्वन्द्वों में भी स्थिर रहती है। वह सभी प्राणियों के प्रति मैत्र भाव रखता है, अद्वेष्टा होता है, और सबमें करुणा होती है।अहंकार, ममता, दम्भ, और असमानता का अभाव होता है। मन निर्मल, शांत और संयत होता है। ऐसे व्यक्ति में वैराग्य और आत्मविनिग्रह (मन और इन्द्रियों का नियंत्रण) होता है।स्वतंत्रता का ज्ञान होता है, जो आसक्ति, अनुराग, और शरीर, पुत्र, वस्तुओं से लगाव नहीं रखता। उसका चित्त हमेशा समान रहता है, न सुख की अति उत्सुकता न दुःख की भारी व्यथा में उलझा रहे।साधक में अनन्य भक्ति होती है, जो परमार्थी, निरपराध, और अविवेचक होती है। साधनाएँ, उपासना में भेद नहीं रहता, समर्पण पूर्ण होता है।अनुभव में वह अपने और ब्रह्म के बीच कोई भेद न देखकर सबमें एकत्व की अनुभूति करता है। उसे लगता है कि सब कुछ उसी का या उसी के स्वरूप का है।माया, जगत की अस्थिरता, जन्म-मरण, बंधन-बंधन की समझ के कारण वह निर्भय, निर्गुण, और उपलब्धि-रहित होता है।उसका ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि कर्म व जीवन में स्पष्ट और सहज अनुभूति बन जाता है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से बंधा नहीं होता।इन सभी लक्षणों से ज्ञात होता है कि साधक ने स्वं और ब्रह्म का ऐक्य प्राप्त कर परम ब्रह्म का अनुभव कर लिया है। इसे भगवद्गीता सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों में आत्मज्ञानी का स्वरूप बताया गया हैस्वयं के ऐक्य और ब्रह्मानुभूति के लक्षण इस प्रकार होते हैं:द्वेष, क्रोध, मोह, भय, सुख-दुख की परवाह समाप्त हो जाती है। साधक में समदृष्टि, समदुःखसुखता आती है, जो जीवन के द्वन्द्वों में भी स्थिर रहती है। वह सभी प्राणियों के प्रति मैत्र भाव रखता है, अद्वेष्टा होता है, और सबमें करुणा होती है।अहंकार, ममता, दम्भ, और असमानता का अभाव होता है। मन निर्मल, शांत और संयत होता है। ऐसे व्यक्ति में वैराग्य और आत्मविनिग्रह (मन और इन्द्रियों का नियंत्रण) होता है।स्वतंत्रता का ज्ञान होता है, जो आसक्ति, अनुराग, और शरीर, पुत्र, वस्तुओं से लगाव नहीं रखता। उसका चित्त हमेशा समान रहता है, न सुख की अति उत्सुकता न दुःख की भारी व्यथा में उलझा रहे।साधक में अनन्य भक्ति होती है, जो परमार्थी, निरपराध, और अविवेचक होती है। साधनाएँ, उपासना में भेद नहीं रहता, समर्पण पूर्ण होता है।अनुभव में वह अपने और ब्रह्म के बीच कोई भेद न देखकर सबमें एकत्व की अनुभूति करता है। उसे लगता है कि सब कुछ उसी का या उसी के स्वरूप का है।माया, जगत की अस्थिरता, जन्म-मरण, बंधन-बंधन की समझ के कारण वह निर्भय, निर्गुण, और उपलब्धि-रहित होता है।उसका ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि कर्म व जीवन में स्पष्ट और सहज अनुभूति बन जाता है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से बंधा नहीं होता।इन सभी लक्षणों से ज्ञात होता है कि साधक ने स्वं और ब्रह्म का ऐक्य प्राप्त कर परम ब्रह्म का अनुभव कर लिया है। इसे भगवद्गीता सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों में आत्मज्ञानी का स्वरूप बताया गया हैइस प्रकार ऐक्य का मूल अर्थ है विभिन्न तत्वों का एक रूप या एक स्वरूप में सम्मिलित होना, जो अध्यात्मिक, दार्शनिक समेत Read More
November 24, 2025 मनुष्य के मस्तिष्क का आकार भौतिक रूप से तो पृथ्वी पर ही सीमित है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से कहा जाता है कि मस्तिष्क का अनुभव और क्रियाशीलता अन्तरीक्ष (आकाशवाणी या अंतरिक्ष) में विस्तार पाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मस्तिष्क केवल तंत्रिका कोशिकाओं और उनके संपर्कों का भौतिक संगठन है, परंतु ध्यान और समाधि की गहन अवस्था में मस्तिष्क की गतिविधि में उल्लेखनीय बदलाव होते हैं जो चेतना के विस्तार और आंतरिक्षीय अनुभूति की संभावना देते हैं।न्यूरोथियोलॉजी (spiritual neuroscience) के अध्ययनों से पता चलता है कि गहरे ध्यान या आध्यात्मिक अनुभव के समय मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्र सक्रिय हो जाते हैं, जैसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स एवं पारासाइम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र, जो व्यक्ति को समय, स्थान से परे आत्मा की अनुभूति कराने में सहायक होते हैं। इस अवस्था में मस्तिष्क के आयाम भौतिक रूप से भले न बदलें, लेकिन चेतना के अनुभव और मस्तिष्क की क्रियाएँ आंतरिक रूप से विस्तारित हो कर व्यापक अंतरिक्षीय अनुभूति से सामंजस्य स्थापित कर लेती हैं।अर्थात्, मस्तिष्क का आकार शारीरिक स्तर पर स्थिर रहता है, लेकिन उसका सत्ता और अनुभूतिक स्वरूपतो विभिन्न चेतना स्तरों पर और अन्तरिक्षीय अनुभूतियों के संदर्भ में “बढ़ा” हुआ या विस्तारित समझा जा सकता है। यह विस्तार शारीरिक मस्तिष्क के बाहर, चेतना और ऊर्जा के क्षेत्र में आध्यात्मिक अनुभव के रूप में होता है।इसलिए, मनुष्य के मस्तिष्क का आकार भौतिक स्तर पर सीमित रहकर भी ध्यान, समाधि जैसी गहन आध्यात्मिक अवस्थाओं में अन्तरिक्षीय चेतना और अनुभव के विस्तार का आधार बनता है, जो भौतिक सीमा से परे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विस्तार दर्शाते हैं। समाधि की अवस्था में शरीर में गूंजती हुई अनाहद आवाज (अनाहत नाद) एक सूक्ष्म, अप्रकाशित ध्वनि होती है जिसे साधक शरीर के बाहर आंतरिक्ष में सुनने जैसा अनुभव करता है। यह आवाज भौतिक कारणों से नहीं, बल्कि ऊर्जा और चेतना के स्तर पर उत्पन्न होती है। समाधि में साधक का मन और चेतना इतना निर्मल और एकाग्र हो जाती है कि वह इस अनाहत नाद को बाहरी अंतरिक्ष में महसूस करता है और अपनी देह से बाहर निकलती हुई इसकी गूंज सुनता है।इस स्थिति में, शरीर में एक सूक्ष्म कंपन (vibration) और हल्की करंट जैसी अनुभूति होती है, जो साधक को बाहरी ध्वनियों से अलग एक दिव्य अनुभव प्रदान करती है। यह आवाज साधक के सूक्ष्म शरीर की परतों और चक्रों में उठती हुई kundalini ऊर्जा से जुड़ी मानी जाती है, जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) तक की यात्रा के दौरान प्रकट होती है। समाधि की अवस्था में अहंकार नष्ट होकर चेतना एक उच्चतर, अव्यक्त ध्वनि-आधारित एहसास में विलीन हो जाती है, जिससे साधक खुद को शरीर से परे, पूरे ब्रह्मांड के साथ एकीकृत महसूस करता है।यह अनुभव ध्यान, अजपा जाप, और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन से प्राप्त होता है और इसे शुद्ध आध्यात्मिक जागरण की वृत्ति माना जाता है। साधक अपने भीतर एक अनाहत स्वर्गतल की स्थिति का अनुभव करता है, जहां यह दिव्य गूंज निरंतर होती रहती है।संक्षेप में, समाधि की अवस्था में जो अनाहद आवाज शरीर के बाहर आंतरिक्ष में सुनाई देती है, वह सूक्ष्म आध्यात्मिक कंपन का प्रतीक है जो साधक की चेतना की उच्चतम अवस्था को दर्शाती है। यह अनुभव साधक को आत्मा के ब्रह्मांडीय स्वरूप से जोड़ता है और भौतिक संसार से परे एक गूढ़ दिव्यता का आभास कराता है।समाधि की अवस्था में शरीर के बाहर आंतरिक्ष में गूंजती अनाहद आवाज़ जैसे अनुभव के वैज्ञानिक स्पष्टीकरण में मुख्य रूप से मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की क्रियावली शामिल होती है। ध्यान या समाधि में मस्तिष्क की ध्यान केंद्रित अवस्था में विभिन्न मस्तिष्क तरंगों (जैसे अल्फा, थीटा, डेल्टा) का सृजन होता है, जो शरीर के भीतर कंपन और ध्वनि जैसे अनुभव उत्पन्न कर सकते हैं।वैज्ञानिक दृष्टि से यह आवाज़ तंत्रिका प्रणाली में सूक्ष्म विद्युत सिग्नलों (neural oscillations) या मस्तिष्क की संवेदी व्याख्या (sensory processing) में बदलाव के कारण मस्तिष्क के आंतरिक “ध्वनि” संसाधन से भी हो सकती है। कुछ शोधों के अनुसार, यह अनुभव कानों में ‘टिनिटस’ (कानों में झिनझिनाहट या घंटी बजना) या मस्तिष्क में ध्वनि-प्रसंस्करण के दौरान उत्पन्न आंतरिक ध्वनि का परिणाम हो सकता है। ध्यान की गहरी स्थिति में बाहरी संवेदनाओं का कम होना और आंतरिक संवेदनाओं का अधिक तीव्र अनुभव मस्तिष्क को ऐसे आवेग उत्पन्न करने के लिए प्रेरित करता है जो अनाहत नाद की भांति महसूस होते हैं।इसके अतिरिक्त, सूक्ष्म ऊर्जा सिद्धांतों के वैज्ञानिक पहलू भी विचाराधीन हैं, जैसे कि तंत्रिका तंत्र में विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के सामंजस्य द्वारा ऊर्जा का कंपन, जो शरीर से बाहर विस्तृत होते हुए ध्वनि के रूप में अनुभूत हो सकते हैं।परंतु, अभी इस विषय पर पूर्ण वैज्ञानिक समझ विकसित नहीं है क्योंकि यह अनुभव मुख्यतः व्यक्तिपरक (subjective) है और साधना, ध्यान की गहन आध्यात्मिक स्थिति से उभरता है, जो विज्ञान के परंपरागत उपकरणों से मापा या प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करना कठिन है।संक्षेप में, समाधि में सुनाई देने वाली अनाहद आवाज़ मस्तिष्क की गहन ध्यान-स्थिति में उत्पन्न तंत्रिका और मानसिक प्रक्रियाओं का परिणाम हो सकती है, जिसमें सूक्ष्म विकिरण और ध्यान की विशेष अवस्था के कारण आंतरिक ध्वनि-प्रत्यय का अनुभव शामिल है, और इसके साथ ही आध्यात्मिक अनुभवों का भी महत्व है। Read More