आज रात जब आंख खुली तो लगा कि पिताजी मुझे अपने। साथ ले कर जाने लगे और कहा व्हलो कुछ समय के लिए तुम।मेरे साथ घूम लेना और मन लग जायेगा मैं चला तो ऐसी जगह उनके साथ पहुच गया जहाँ मा भाई और मेरे पूर्वज जिनको नही देखा से एक जगह इकट्ठे हो जश्न मना रहे थे मधुर मधुर झंकार की आवाज आ रही थी वही से विमान में बैठ कर कहि ओर जगह का पता नही जाना था विमान हमको।आंतरिक्ष में उस जगह ले गया जहाँ न हवा न पानी न सांस लेने की गुंजाइश बस बिना वायु के हम उस विमान में सफर कर रहे थे जहां सिवाय शुण्य के कुछ भी नही था एक ऐसे अनजान जगह पर विमान उतर गया हम सब उतर गए वहां पर जश्न हो रहा था जैसे हमारेआने की सूचना उनको थी ताभि एक पारदर्शी देह धारण संत आये जो पातदेर्शि थे उनके शरीर से ऊर्जा निकल रही थी और उनकी ऊर्जा से हम सब पारदर्शी बन ऊर्जा में बदल गए ओर उनके साथ हम समाधि में समाधिष्ठ हो पूर्ण ऊर्जा रूप में नजर आने लगे और ऐसा लग हमारा शरीर ऊर्जा में बदल।कर जमी के ऊपर आंतरिक्ष में समाधि अवस्था मे तैर रहा है और लाखों तारे जैसे हमारे शरीर के निचे तैर रहे है ओर “आंतरिक्ष” का अनुभव हो रहा है जिसे हम आमतौर पर कुछ इस तरह समझा जाता है:
जब ध्यान बहुत गहरा हो जाता है, तब मन की चंचलता रुकने लगती है। उस समय भीतर एक विशाल खालीपन, शून्य, या असीम आकाश जैसा अनुभव हो सकता है। साधक को लगता है कि शरीर पीछे छूट गया है और चेतना किसी विस्तृत, शांत, निराकार क्षेत्र में टिक गई है।
यह अनुभव कई रूपों में नजर आ सकता है ये पिताजी का कहना था ऊपर आंतरिक्ष में काला धुवा जैसा रंग वो भी पारदर्शी उसके आर पार देखा जा सकता था कि कुछ है जो पारदर्शी है शून्य जैसा आकाश
सब कुछ खाली, विशाल, बिना सीमा के लगता है। जो असीमित था.गहरा अंधकार
यह डरावना अंधकार नहीं, बल्कि ऐसा मौन अंधकार था जिसमें कोई हलचल नहीं।वही प्रकाश की एक टिमटिमाती बिंदु जो सुई की नोक से लाखों गुना छोटी पर नगन आंखों से नजर आ रही थी जो हमसे बहुत बहुत दूर थी नजर आ रही थी उस तक अंधेरे की लकीर जो उस तक पहुच रही थी उस माध्यम से पहुच सकते थेवहःसूक्ष्म प्रकाश
कभी-कभी उस शून्य में बहुत छोटी ज्योति, बिंदु, या चमक दिखाई देती है।यहां मेरा शरीर रूपी देह- का भाव का लुप्त हो रहा था
शरीर का अहसास कम हो रहा था , जैसे “मैं शरीर नहीं हूँ” का संकेत मुझे मिल रहे थे ओर लगा कीमेरा साक्षी-भाव में सब कुछ होते हुए भी भीतर एक शांत देखने वाली चेतना बनी हुई थी जो मुझे होने का अहसास दे रही थी मेरी सोच ओर पिताजी के कहने के अनुसार उसे हम सोचे तो वहः एक
आध्यात्मिक दृष्टि से इसे महाशून्य, चिदाकाश, या भीतर का अनंत आकाश थी या उसे उपरोक्त कहा जा सकता है।यहाँ मुझे जो समझ आया वहः मेरे सूक्ष्म शरीर कि चेतना का विस्तार शरीर और मन से बहुत बड़ा था जो अनुभव हो रहा था पर पहले अनुभव से अलग जिसे बया करना मेरे बस में नही था न कभी सोच सकता था कि विमान मुझे ऐसे स्थान पर ले जाएगा
अगर इसे एक वाक्य में कहें, तो:
“समाधि में आंतरिक्ष का अनुभव, बाहरी आकाश नहीं बल्कि चेतना के भीतर के अनंत शून्य का अनुभव है।”
“महा-शून्य के पार सूक्ष्म बिंदु की ज्योति है, और गहन, गुप्त अंधकार में रूह का निरंतर ऊर्ध्वगमन होता रहता है—जिसे केवल अनुभूत किया जा सकता है, शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।”महा-शून्य के परे एक बिंदु-प्रकाश है; गहन, छुपे अंधकार में रूह सतत ऊर्ध्व दिशा में गमन करती है—यह अनुभव किया पर शब्दो मे बया किया नहीं जा सकता।”

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