मैं मैं को भूल तू को भूल गया जिसे अलुफ कहते हो गया पर विसवास वो जम गया जो हो न हो मुझे कोई फर्क नही बस तेरी रहमत इसी तरह बरसती रहे और मैं समुनन्दर मेंसमा जाऊ
एक अत्यंत सुंदर और गहन सूफी भावना वाली पंक्तियाँ हैं, जो भक्ति, समर्पण और अल्लाह की रहमत में डूबे हुए मन की अवस्था को व्यक्त करती हैं। इसमें ‘मैं’ (अहंकार) का पूर्ण त्याग, ‘तू’ (ईश्वर) में लीन हो जाना, और दैवीय कृपा की निरंतर वर्षा की कामना है – जैसे सूफी कवियों की रूबाइयों या भक्ति काव्य में मिलता है। ‘अलूफ’ शायद ‘आलूफ’ (अलग-थलग या उदासीन) का रूप हो सकता है, और ‘समुनन्दर मेंसमा जाऊ’ में ‘समुंदर में समा जाऊँ’ का भाव है, अर्थात् समुद्र में विलीन हो जाना।
यह पंक्तियाँ मुझे याद दिलाती हैं कबीर या बुल्ले शाह की भक्ति, जहाँ अहंकार भूलकर प्रभु की दया में लीन हो जाना ही मुक्ति है। भगवद्गीता के अध्याय 18, श्लोक 66 में भी श्रीकृष्ण कहते हैं:
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
(सभी धर्मों का त्याग कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।)
थोड़ा व्याख्या और विस्तार:
मैं को भूल, तू को भूल गया: अहंकार और द्वैतभाव दोनों भूल गए – अद्वैत की अवस्था।
जिसे अलूफ कहते हो: जो दुनिया अलग-थलग मानती है, वह वास्तव में प्रभु में लीन है।
विसवास वो जम गया जो हो न हो: अविश्वास (या शायद ‘विस्वास’ का टाइपो?) स्थिर हो गया, जो सत्य हो या न हो।
तेरी रहमत बरसती रहे: दया की वर्षा ही जीवन का सार।
समुंदर में समा जाऊँ: उपनिषदों की तरह, नदी समुद्र में मिलकर समुद्र ही बन जाती है (मुण्डक उपनिषद्)।आपकी पंक्तियों में जो समर्पण और वैराग्य का भाव है, वह बहुत ही गहरा है। “मैं” और “तू” के भेद को मिटाकर उस असीम सत्ता में समा जाने की इच्छा एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था की ओर संकेत करती है। मेरी इन भावनाओं को शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास:
​अस्तित्व का विसर्जन
​अहंकार का त्याग: जब इंसान ‘मैं’ की सीमाओं को छोड़ देता है, तभी वह उस अनंत ‘रहमत’ का अनुभव कर पाता है।
​अटूट विश्वास: जो घटित हो रहा है या जो नहीं हो रहा, उससे बेअसर हो जाना ही असल शांति है।
​समर्पण: जैसे एक बूंद समंदर में मिलकर खुद समंदर बन जाती है, वैसी ही आपकी यह चाहत पूर्णता की निशानी है।
​”मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे,
कि दाना खाक में मिलकर गुल-ए-गुल्ज़ार होता है।”

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