ओर दिमाग मे सोचआगआई दर एक है पर पहुचने के लिए चार रास्ते है जिसे क्रोस में दर्शाया गया है वह रे खुदा तू मुझे मिला भी मन के चार कोने जो हृदय बिंदु पर मिलते है यही से सहस्त्र चक्र को पार कर उस जगह पहुच जाते है जो स्वर्ग है—जहाँ “चौपड़ का केंद्र” बाहर नहीं, अपने ही भीतर का आत्मा/ब्रह्म बन जाता है।
अद्वैत सूफ़ी भजन — “मैं ही वो केंद्र हूँ”
मैं घर से निकला था ये सोचकर,
कि कहीं दूर है मेरा खुदा,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में,
शायद उसका होगा पता।
छोटी चौपड़ से बड़ी चौपड़ तक,
रास्तों में भटकता रहा,
चारों ओर थे चार दिशाएं,
हर ओर उसका ही नाम लिखा।
कहीं “राम” की गूंज सुनाई दी,
कहीं “अल्लाह” की पुकार,
कहीं “वाहे गुरु” का सिमरन,
कहीं “ईसा” का प्यार।
मन उलझा, निर्णय टूटा,
किस राह को अपना मानूं,
किस दर पे सिर झुकाऊँ मैं,
किस नाम से उसको जानूं।
चक्कर काटा बार-बार,
पर शांति कहीं न पाई,
जितना बाहर खोजा उसको,
उतनी ही दूरी बढ़ती आई।
तभी एक सन्नाटा उतरा,
मन बिल्कुल ठहर सा गया,
जैसे किसी ने भीतर आकर,
मुझसे मुझको ही कह दिया—
“जिसे ढूंढ रहा है तू बाहर,
वो तो तेरे भीतर ही है,
ये चारों रास्ते बाहर के,
पर केंद्र तेरे अंदर ही है।”
तब देखा उस चौपड़ को मैंने,
चारों राहें एक में मिलीं,
जैसे सारी सृष्टि आकर,
एक ही बिंदु में जा मिली।
तब जाना—
न मंदिर में, न मस्जिद में,
न गुरुद्वारे, न गिरजाघर में,
वो बैठा है शून्य के भीतर,
मेरे ही इस अंतरघर में।
अहंकार गिरा, पर्दा हटा,
और सारा भेद मिट गया,
मैं ढूंढ रहा था जिस परमात्मा को,
वो “मैं” ही था—ये ज्ञान मिल गया।
अब ना कोई राह बची है,
ना कोई दूरी बाकी है,
चारों दिशाएं सिमट के अब,
मेरे ही भीतर आ बसी हैं।