मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर की आध्यात्मिक यात्रा।

। विभिन्न धर्मों और परंपराओं में मृत्यु के बाद की यात्रा के बारे में अलग-अलग मान्यताएँ हैं। इसे किसी निश्चित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि इस आध्यात्मिक म्रत्यु को हम जब समाधि की अवस्था मे जीते जी मौत को देखते है तो ऐसा लगता है जीवन की अंतिम साँस पूरी हो रही है , इस अवस्था मे मेरे चेहरे पर भय नहीं, था बल्कि गहन शांति थी घर मे मातम छाया हुआ देख रहा थायोग बाग इधर उधर भाग रहे थे, कोई मोबाइल तो कोई टिकिट बुक।करवाने तो को कार किराए पर लेने के लिए भटक रहा था पर मेरे होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी। क्योकि मैं ये सब ध्यान की उस अवस्था मे देख रहा था जिसे हम जीते जी म्रत्यु का आभास कहते है इसके बिना जीवन मे मोह खत्म नही हो सकता और मॉया से अलग जब देख लिया कि।मौत ये है इसी में मुझे भी मिट जाना है पर गुरु का स्थूल ओर सूक्ष्म शरीर के साथ होना ही मेरे लिए एक सकून था कि कोई तो है मुझे लगा कि अब अंतिम श्वास निकल।रही है ओर आत्मा शरीरसे अंघुथे से होती हुई सहस्त्र चक्र की ओर बढ़ रही है मैं अनुभव कर रहा कि अब मेरा साथ छूट रहा है और मेरे शरीर से आत्मा निकल।कर एक ऐसे आसमान की तरफ उड़ रही है जहाँ न कोई लोक।न तारे न नक्षत्र न ग्रह बस एक उजाला जिसका सन्त ही नही था कबूतर की तरह उड़ चला थाआई जनता था शरीर एक वस्त्र की तरह पीछे रह गया हो। ओर स्वम् हल्का ही नही अत्यंत हल्का अनुभव करने लगा था पर आभाह था कि मैं आसमान में बिना शरीर उड़ रहा हु ओर कोई मुझे ले। जारहा है निष्प्राण ओर शरीर निष्क्रिय पड़े को दूर से देख कर खुश हूं कि चलो।पीछा छूटा अब न गहरवार न कोई जिम्मेदारी बस आनंद ही आनंद महसूस कर रहा था , जब रिस्तेदारो ओर खुद के कहने वालों की तरफ देखा उनमे से किसी के मन मे अशांति किसी के मन मे शौक तो ककी खुश था चलो जाने वाला गया हमे अपने बंधनो से मुक्त कर गया ताभि मेरी आत्मा को लगा कि आगे की राह में दिव्य प्रकाश ही दिव्य प्रकाश है उस प्रकाश में उसके सद्गुरु खड़े थे उनका संदेश था जब जीवन का असनन्द लिया है तो म्रत्यु को भी जानो ताकि जीवन म्रत्यु का भेद खत्म हो जाये और जीते जी मौत का अहसास हो जाये तुम
भय मत करो। जो जन्मा था वह शरीर था; तुम चेतना हो। अब तुम्हारी अगली यात्रा आरंभ होती है।” रभी मुझे मेरे आईना दिख जो उस वक़्तएक दर्पण की तरह मेरे सामने प्रकट हुए। जहाँ उसने मुझे सबक दिया और मेरे अवगुणों को गिनाया था, वहाँ प्रकाश था। जहाँ उसने किसी को दुःख पहुँचाया था, वहाँ सीख का अवसर दिखाई दिया
सिशे में मुझे तैरता हुआ एक विशाल प्रकाश-सागर दिखाई दिया। वहाँ न दिन था, न रात; न समय था, न दूरी। केवल गहन शांति थी मैं सझ गया था गुरु के आशिर्रवाद से मेरे अंतिम यात्रा की यह वह सीमा है जहाँ तक शब्द पहुँचते हैं। फिर अनुभव है।”
ताभि लगा कि मेरे भीतर और बाहर का भेद मिट रहा है। “मैं” और “तू” की दीवार गिर गई। वो ही रह गया ताभि मेरे गुरु ने मेरी आँखें खोल दी और जो स्वप्न देख रहा था उससे बाहर आ गया ताभि सोचने लगा कि जिंदगी ख्वाब है पर हमें पता म था कि हमे जिनदगी से बहुत प्यार था पर जब बिछड़ गए तो लगा क्या वो भी अजीब संसार और ये भी अजीब मेरा अनुभव था गुरु सीखा गए मैं ओर तू का खत्म हो वो को।जिंदा आत्मा कर संग रहना था जीवन म्रत्यु तो एक बोध है समझ गया जीवन और मौत तो एक संस्कार है जिसे पा कर ही भाव सागर पार किया जा सकता है अन्यथा नही।

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