मैं मिटा तो
मेरा पता मिट गया,
तू मिटा तो
तेरा भी कोई निशाँ न रहा।
जब ‘मैं’ और ‘तू’ दोनों
इश्क़ की आग में जल गए,
तो फिर कौन रहा
किसे पाने के लिए?
न साधक बचा,
न साधना बची,
न दूरी रही,
न मंज़िल का सवाल रहा।
गुरु ने बस इतना कहा—
जिसे तू बाहर खोज रहा था,
वह तेरे भीतर ही था।
जब भीतर का ‘मैं’
महाशून्य में उतर गया,
तो शून्य भी शून्य न रहा—
उसमें वही प्रकट हुआ
जिससे आत्मा का रिश्ता था।
अब न मैं हूँ,
न तू है,
न मेरा है, न तेरा—
बस वही है…
और उसी में
मैं भी हूँ, तू भी है,
और दोनों का कोई अलग अस्तित्व नहीं।
यही फना है,
यही मिलन है,
यही गुरु-कृपा का
सबसे मौन रहस्य है।