समझ गया म हाशून्य में जाकर जो सकूँन मिला जो स्वम की रूह को चेतन्य में पाया ताभि समझ मे आया गुरु गोविंद दोनो।खड़े किसके लागू पाव बल हारी गुरु आप ने चेतन्य को दिया समझाए
मेरी उपरोक्त बात में एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति झलक रही है। जो मैंने साधना के दौरान समाधिनकी अवस्था मे अपनी रूह जो एक नारेंगी कि गोली की तरह बैंगनी रंग लिए ऊपर आकाश में उड़ कर उस स्थान पर जा रही थी जहा गुफा में अंधेरा पर गुफ जैसे सिकुड़ रही थी शरीर का अंत तक पहुचना मुहक़ील था पर अनन्त में प्रकाश का सुराख नजर आ रहा था वही प्राक्कश मुंह आगे ले जा रहा था अंत मे वही प्राक्कश बिंदु इतना बड़ा प्रकाश पुंज का क्षेत्र ब। गया जिसकी कल्पना मुझे नही थी अब मैं प्रकाश में तैर रहा था सामने दो प्रकाश में बनी आकृति नजर आ रही थी नो एक गुरु देव की थी दुसरीं अनजान सिर्फ प्रकाश पुंज का गोला जो मैंने “महाशून्य” और “चेतना” का अनुभव बताया, वही असल में साधना का ही केंद्र है—जहाँ व्यक्ति अपने “स्व” (रूह/आत्मा) को सीधे महसूस करता है, बिना किसी बाहरी सहारे के।
आपने जो पंक्ति कही —
“गुरु गोविंद दोनो खड़े, किसके लागूँ पाँव…” — यह कबीर का प्रसिद्ध दोहा है। इसका गहरा अर्थ है:
“बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय”
यानी, गुरु ही वो माध्यम है जिसने आपको परमात्मा (गोविंद) तक पहुँचने का रास्ता दिखाया। मेरे इस अनुभव से यह स्पष्ट है कि:
महाशून्य में जाकर मन का शोर खत्म होता है
वहाँ नाद, शांति और शुद्ध चेतना का अनुभव होता है
और उसी क्षण समझ आता है कि गुरु ने केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि अनुभव का द्वार खोला वलो ईश्वर है जिसके बिना ये यात्रा संभव नही
यहाँ एक सूक्ष्म बात समझनी जरूरी है—
परमात्मा (गोविंद) तो सदा से है, लेकिन उसे “जानना” और “जीना” गुरु की कृपा से ही संभव होता है। इसलिए कबीर ने गुरु को पहले प्रणाम किया।
आपकी पंक्ति “गुरु को आप ने चेतना बताने वाला समझा मेरी आध्यत्मिक — सोच के अनुसार असली बिंदु तो गुरु है यही असली बिंदु है।
गुरु बाहर से कुछ देता नहीं, बल्कि भीतर सोई हुई चेतना को जगा देता है।
लेकिन एक संतुलन भी जरूरी है:
कई बार “महाशून्य” या “शून्यता” के अनुभव को अंतिम मान लिया जाता है, ओरसाधक अपने को पूर्ण मॉन लेता है जबकि बहुत-सी परंपराओं जैसे अद्वैत वेदांत) में कहा गया है कि:
शून्य के पार भी पूर्ण चेतन्य (चैतन्य) है
जहाँ “मैं” और तू ” का भेद भी खत्म हो जाता है ओर रहता है एक चेतन्य प्रकाश यानी E =mc2 or mc2 is absolutely energy means god energy that was realised by my guru. Naman