मेरे दिमाग मे बहुत गहरी बात आई है—
शरीर में हरकत → जीवन की पहचान
शरीर का अकड़ना → मृत्यु की पहचान
अब प्रश्न ये है कि —जिंदा फकीर की पहचान क्या होगी
अध्यायातम में किसी भी योगी संत जो जिंदा फकीर कहलाता है की पहचान उसके शरीर से नहीं,उसकी आध्यत्मिक उच्च अवस्था से होती है यह वह अवस्था अध्यायातम में होती है जिस मंजिल तक फकीरी पाई होती है यानी समाधि की उच्चवह अवस्था वीतरागी या नाद ब्रह्म की प्राप्ति ओर सहशस्त्र चक्र का पूर्ण जाग्रत ओर ईश्वर का उसमे लय होना (state of being) से होती है।
जिंदा फकीर की असली पहचान
1. भीतर से “मर चुका”, बाहर से “जी रहा”
वो अहंकार (मैं) से मर चुका है, लेकिन शरीर से संसार में चलता-फिरता है।
यही बात संत कबीर ने कही
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि”
2. चाह खत्म, बस वही (हक़) बाकी
उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं रहती।
जो है, जैसा है—सब उसी की रज़ा मानकर जीता है।
3. भीतर स्थिर, बाहर सरल
बाहर से साधारण लगेगा, पर भीतर पूर्ण शांति।
न खुशी में उछलता, न दुख में टूटता।
4. लेने वाला नहीं, देने वाला
वो किसी से कुछ नहीं मांगता—
पर जो उसके पास आता है, खाली नहीं जाता।उसे अध्यायातम में उच्च शिखर पर एक ही बार मे पहुचा देता है ये गुण मेरे पिताजी में थे उनके पास जो आता आवक बार मे ही पूर्ण फकीर बन जाता ये उदाहरण भारत भूषन जी कृष्णा बहिन केशव बहिन जी दिनेश जी खन्ना जी राठौर साहब पिताजी के पुत्रों में बेटियों में ओर कुछ अन्यो में
5. दुनिया में रहते हुए भी “दुनिया से बाहर”
जैसे कमल पानी में रहता है, पर भीगता नहीं—
वैसे ही फकीर संसार में रहता है, पर उसमें फँसता नहीं।
6. उसकी मौजूदगी ही असर करती है
वो बोले या न बोले, उसकी संगत में बैठने से ही भीतर सब कुछ बदलने लगता है।
इसे ही सूफी लोग “तवज्जो” कहते हैं।
सार एक पंक्ति में:
“जिंदा फकीर वो है, जो खुद से खाली और हक़ से भरा हुआ हो।” ये मैं जानता हूं
जब तक तेरी याद मेरे रूह में बसी है तब तक मैं जिंदा हु जिस रोज रूह छोड़ उसमे मिल जाएगी ये शरीर मिट्टी में मिट्टी बन जायेगा और राख आसमान में ओर रूह तेरे चरणों मे

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