“जिस प्रकार समुद्र की गहराइयों में हजारों प्रकार के जीव रहते हैं, जिन्हें हम अपनी आँखों से नहीं देख पाते, उसी प्रकार मन की गहराइयों में भी असंख्य विकार छिपे रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और उनके सूक्ष्म रूप मनुष्य को भीतर से अशांत करते हैं। जो साधना, विवेक, सेवा और गुरु-कृपा द्वारा इन विकारों को पहचानकर उनसे मुक्त हो जाता है, जिसका मन निर्मल और स्वच्छ हो जाता है, वही सच्चे अर्थों में संत कहलाता है।”
अद्वैत वेदांत की दृष्टि से भी संत वह है जो मन के विकारों से ऊपर उठकर अपने शुद्ध स्वरूप को जान लेता है। विकार बादलों की तरह हैं और आत्मा सूर्य की तरह। जब बादल हट जाते हैं, तब सूर्य को प्रकट होने के लिए कुछ नया नहीं करना पड़ता; वह तो पहले से ही प्रकाशमान होता है। उसी प्रकार विकार हटने पर आत्मा का स्वाभाविक प्रकाश प्रकट हो जाता है।
“संत वह नहीं जो केवल संसार से दूर हो जाए, बल्कि वह है जिसके मन से विकार दूर हो जाएँ।”