समुंदर में उठती लहरों को पार कर,
ज़माने की बनाई दीवारों को लाँघ कर,
मैं उस सफ़र की ओर निकल पड़ा हूँ,
जो सीधे तेरे दर तक पहुँचाता है।
मैं नहीं जानता यहाँ तक कैसे पहुँचा,
कौन-सी रहमत मुझे खींच लाई,
क्योंकि जो मुझे दिल से चाहते थे,
उन्हें छोड़ आज तेरी राह पर चल पड़ा हूँ।
अब हर कदम जन्नत की ओर बढ़ता प्रतीत होता है,
और संसार पीछे छूटता नज़र आता है।
मोह के बंधन ढीले पड़ रहे हैं,
बस तेरी याद का सहारा बाकी है।
मंज़िल मिले या न मिले, इसकी फ़िक्र नहीं,
तेरी राह में चलना ही मेरी मंज़िल है।
अब मैं नहीं, बस तू ही तू है,
और यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह भाव उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ साधक धीरे-धीरे संसार की आसक्तियों से ऊपर उठकर परम सत्य की ओर अग्रसर होता है। फिर भी, सच्चा अध्यात्म संसार से भागना नहीं, बल्कि ईश्वर को पाकर भी प्रेम, करुणा और कर्तव्य के साथ संसार में रहना सिखाता है। पवन

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