“मैं” जब अहंकार बन जाती है, तब वही सबसे बड़ा पर्दा अध्यायातम में बनती है।
और जब “मैं” समर्पण बन जाती है , तब वही समर्पण आत्मा का द्वार खोलती है।
अध्यात्म में “मैं” को मिटाने का अर्थ स्वयं को नष्ट करना नहीं,
बल्कि उस झूठे अहं को शांत करना है जो कहता है
“सब मैं कर रहा हूँ, मैं ही जानता हूँ, मैं ही श्रेष्ठ हूँ।”
जब यह “मैं” धीरे-धीरे पिघलती है, तब भीतर जगह बनती है
और उसी रिक्तता में परमात्मा का प्रवेश होता है।
कबीर ने भी कहा —
“जब मैं था तब हरि नहीं,
अब हरि हैं मैं नाहिं।”
अर्थात जहाँ अहंकार था वहाँ ईश्वर का अनुभव नहीं था,
और जहाँ समर्पण आया, वहाँ केवल वही रह गया।
पर “मैं” को मिटाना केवल शब्दों से नहीं होता।
इसके लिए कुछ साधन प्रयास शिक्षा और ध्यान समाधि की जानकारी होना जरूरी है जिसमे गीता रामायण और वेद लोर गुरु के द्वारा दी गई शिक्षा का ज्ञान होना आवश्यक हैं —
विनम्रता
सेवा
सच्चा प्रेम
ध्यान
गुरु कृपा
और अपने दोषों को देखने का साहस
जो व्यक्ति हर क्षण स्वयं को बड़ा सिद्ध करना चाहता है,
वह भीतर से दूर होता जाता है।
लेकिन जो कहता है —
“हे प्रभु, मैं कुछ नहीं, सब तुम हो”
उसके भीतर शांति उतरने लगती है।
सच्ची आध्यात्मिक उन्नति तब शुरू होती है
जब व्यक्ति अपने अस्तित्व को परम चेतना में विलीन होने देता है।
तब साधक नहीं रहता, केवल साधना रह जाती है।