एक आध्यात्मिक रूह जब रूहानी रूह बनती है,
तो उसका सफर शब्दों से नहीं, अनुभवों से लिखा जाता है।
वह लोक आँखों से नहीं दिखता,
न ही तर्क से समझा जाता है —
उसे केवल महसूस किया जाता है,
गुरु की कृपा, नज़र और अनुभव के द्वारा।
जब भीतर की आवाज़ जगती है,
तो मन का शोर शांत होने लगता है।
अहंकार धीरे-धीरे पिघलता है,
और आत्मा अपनी असली पहचान की ओर बढ़ती है।
फिर साधक को लगता है —
यह शरीर केवल एक वस्त्र है,
असल यात्रा तो चेतना की है।
जहाँ न दिन होता है, न रात,
न दूरी, न समय,
बस एक अनंत शांति और प्रेम का सागर।
गुरु उस राह का दीपक होता है,
जो उस अनजाने लोक का द्वार खोलता है।
वह शब्दों से कम,
अपने अनुभव और ऊर्जा से अधिक सिखाता है।
उसकी संगत में रूह को अपनी मंज़िल की खुशबू आने लगती है।
वहाँ पहुँचकर साधक कह उठता है —
“मैं खोजता रहा तुझे मंदिरों और राहों में,
तू तो मेरे ही भीतर बैठा था।
जब गुरु ने परदा हटाया,
तब जाना —
रूह का सफर उसी तक था,
जहाँ से वह आई थी।”
आध्यात्म में उस लोक को अलग-अलग नाम दिए गए हैं —
सत्यलोक, अनहद, शून्य, नूर, ब्रह्मलोक या परमधाम।
पर जो उसे छू लेता है,
वह जान जाता है कि सत्य को केवल जिया जा सकता है,
पूरा कहा नहीं जा सकता।