अगर हो सच्चे भक्त,
तो सर पर कफ़न बाँध
गुरु के संग चल पड़ो फिर ये ख्याल दिल।मे न हो कि हमने सही चुना या गलत जब समर्पण कर दिया तो पिता के घर ससुराल जाना है ये जानते हुवे की ससुराल ये गुरु द्वारा नही वो घर है जहाँ से लौट के न आना है ये जान् ते हुवे की
राह चाहे काँटों से भरी है वहा मुलायम घास चलने को नही मिलने वाली है समर्पण कर दिया तो अब सोच क्या चाहे कुछ भी हो मंजिल तो इसी जीवन मे गुरु के सानिध्य से मुझे पानी है अब चाहे तो
ज़माना ठुकरा दे, या ठुकरा दे ये समाज अब तो तेरे संग जीवन जीना है चाहे बीच आजये मौत
माया लाख जाल बिछाए चाहे दे लालच दे ये कितना भी संसार फौजी बन के बांध कफ़न अब त्याग दिया ये भौतिक सनसार
जिसे गुरु का हाथ मिल जाए,
उसे मंज़िल तक पहुचने से कोई रोक नहीं सकता जानता हूं
गुरु संग चलना केवल साथ चलना नहीं, उसके साथ सुख दुख में साथ देना ही है
लक्ष्य मॉन छोड़ दिया ये संसार मन में बसे विकार अहंकार मोह माया घमण्ड जलन द्वेष त्याग अब बन गया जोगी जानता हूं मानता हूं
जहाँ “मैं” मिटता है,
वहीं से सत्य का द्वार खुलता है।
भक्ति जब पूरी होती है
जब डर खत्म हो जाए,हो संमरपित हो जाये गुरु के द्वार और गुरु कह उठे—बेटा तुझे
“अब जो भी हो,
इसी राह में ही जीना है,
ओर इसी राह में ही मिट जाना है।”