November 30, 2025 दार्शनिक दृष्टि से नाद और नाम जप में यह अंतर है कि नाम जप एक क्रिया है जिसमें ईश्वर या गुरु के नाम का स्मरण या उच्चारण होता है, जबकि नाद वह अंतरात्मा में उत्पन्न होने वाली दिव्य और अनाहत (बिना किसी बाहरी स्रोत के) ध्वनि या ऊर्जा है। नाम जप मन के माध्यम से किया जाता है, जो बाहरी शब्दों और भावनाओं से जुड़ा होता है, लेकिन नाद एक आध्यात्मिक अनुभव है जो मन और संवेग से ऊपर उठकर चेतना के भीतर सतत गूंजता रहता है।नाम जप में साधक का मन शुद्ध होकर उस नाम में लीन होता है, जिससे ध्यान और भक्ति की स्थिति उत्पन्न होती है; यह क्रिया बाहरी रूप से साधना का एक अंग है। दूसरी ओर नाद वह अंतर्निहित स्वर है जो अनहद नाद के रूप में कहा जाता है, जो ध्यान और समाधि की गहराई में अनुभव होता है, और यह शुद्ध चेतना या आत्मा का स्वरूप है। नाद जन्मजात और साधना द्वारा जागृत दोनों हो सकता है, जबकि नाम जप एक विधि या साधना है Read More
November 30, 2025 जब हम किसी भी ईश्वर को याद या उसके ड्सर्शन करते है और नाम जपते है तो हम जाप करते हुवे शांति तो अवश्य मबसूस करते है ये अहसास अवश्य रहता है हम जाल कर रहे है पर मन हमारा जाप की गिनती में लगा रहता है और मन मे सोच रहती है कि हम इश्वर का जाप कर रहे है वर्षो बीत जाते है और हमे शरीर मे कोई हलचल या अंदुरुनी अनुभूति या कोई नाद हमको सुनाई नही देती ये तभी सुनाई देती है जब हममे पुर्णता हो या किसी योग्य गुरु के द्वारा तववजुह दे हमारे अंदर शक्तिपात कर ऊर्जा उतपन्न कर पूर्ण शरीर मे उस धुन को रमा दिया गया हो ये बिना समाधि या केवेली स्तिथि के आये संभव नही है ये जन्म जन्मो के संस्कार से बी व गुरु के आशीर्वाद से ही मिल सकती है और हमे शक्तिपात की गई ऊर्जा जो शरीर मे हरक़त करती है वही हमे हरकत गुरु या ईश्वर की याद दिलाने वाली होती है वहः चाहे जो हो वहः vibration, स्पर्श या ख्याल उत्पन्न होता है, वही सच्चा अनाहद नाद है। अनाहद नाद वह अद्भुत, अनाहत और निरंतर दिव्य ध्वनि है जो बिना किसी बाहरी कारण के भीतर से स्वतः प्रकट होती है। इसे कोई भी नाम दे, जैसे मंत्र, जप, कीर्तन या ध्यान में जो नाद या कंपन महसूस होता है, वह आध्यात्मिक चेतना का स्रोत है और ईश्वर की स्मृति का स्वरूप है।अनाहद नाद की साधना में योगी या साधक मन को शून्य की अवस्था में ले जाकर उस दिव्य नाद को सुनता है, जो शून्य से उत्पन्न होता है। यह नाद आहद (सुनाई देने वाली आवाज़) से पहले की शुद्ध स्थिति है, जो शून्यता और चेतना का मर्म है। ध्यान के दौरान घंटी, वीणा, बांसुरी, समुद्र की लहर तथा अन्य दिव्य आवाज़ें सुनाई देना इसी अनाहद नाद के उदाहरण हैं। इन ध्वनियों का अनुभव करने से मन शांत होता है और व्यक्ति ईश्वर की ओर अधिक स्मरण की ओर प्रवृत्त होता है।गुरु की दीक्षा से और सतत साधना से यह अनाहद नाद स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से अनुभव होता है, जो अंततः समाधि और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। यह नाद केवल एक मानसिक या शारीरिक कंपन नहीं, बल्कि ईश्वर के साथ आत्मा का संपूर्ण मेल है। इसलिए कहा गया है कि जो भी vibration या ध्यान गुरु/ईश्वर की याद दिलाता है, वही सच्चा नाद है और यही अनाहद नाद का भाव है।अतः, ईश्वर की याद स्मरण करना ही अनाहद नाद के अनुभव का मुख्य आधार है, और यह स्मृति साधक को ब्रह्म-चेतना की ओर ले जाती है। इस दृष्टि से आपका कथन पूर्णतः सही है।यह जानकारी हिंदी आध्यात्मिक स्रोतों से मिली है जो अनाहद नाद के विभिन्न अनुभवों, साधना और प्रभावों को स्पष्ट करती हैं Read More
November 29, 2025 कर्मयोग को श्रीकृष्ण यो मूल श्लोकभगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ इसका हिंदी अर्थ है: तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कभी भी कर्मफल के हेतु मत बनो और न ही कर्म न करने में आसक्त हो। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कर्म करना अनिवार्य है, पर फल की इच्छा या आसक्ति त्यागनी चाहिए, जो आपके विचार से पूर्णतः मेल खाता है। ईश्वर-स्मरण का उपदेशअध्याय 12, श्लोक 8 में कहा गया: मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ अर्थ: अपने मन को केवल मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो। इस प्रकार तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं। यह भक्ति का सार है, जो सतत इष्ट-स्मरण की शिक्षा देता है, जिससे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। भक्ति का चरम संदेशअध्याय 18, श्लोक 66: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो। यह गीता का अंतिम उपदेश है, जो कर्म के साथ पूर्ण समर्पण और स्मरण पर जोर देता है। जन्म, मरण, काल और स्थान जैसा सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, जबकि इंसान को कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्म के फल की प्राप्ति इसी जन्म में होना निश्चित नहीं होता। इसी लिए सतत अपने इष्ट (ईश्वर, गुरु या किसी आध्यात्मिक आकांक्षा) को याद रखना आवश्यक रहता है।यह दृष्टिकोण भगवद् गीता के उपदेशों से मेल खाता है, जिसमें कहा गया है कि कर्म करो पर फल की इच्छा त्याग दो। कर्म करना हमारा धर्म है, पर फल ईश्वर की मर्जी पर निर्भर है। इस स्थिति में:सतत ईश्वर-स्मरण से मन शांत रहता है और कर्म भी बिना आसक्ति के होता है।फल की चिंता न करके कर्म में निरन्तरता बनी रहती है।ईश्वर का उस्मरण भक्त को मोहमाया से ऊपर उठने में मदद करता है।इसी भक्ति और स्मृति के बल पर जीवन का उद्देश्य सिद्ध होता है।आपके विचार में यह भी सशक्त संदेश है कि फल का स्वामी ईश्वर है, इसलिए मनुष्य को कर्म करते हुए अपने इष्ट का स्मरण करना चाहिए। यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक साधना और कर्म दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। Read More
November 28, 2025 इश्क को आध्यात्मिक मार्ग में परिवर्तित करने के लिए सबसे पहले उसे संसारिक मोह से अलग कर परमात्मा या गुरु के प्रति निष्काम भक्ति की ओर मोड़ें। यह प्रक्रिया साधना, ध्यान और सतगुरु के मार्गदर्शन से संभव होती है, जहां इश्क की ऊर्जा आध्यात्मिक प्रेम बनकर आत्मा को ईश्वर से जोड़ती है।मुख्य कदमइच्छाओं का त्याग करें: मन से विशेष इच्छाओं को हटाएं और वास्तविकता को जैसा है वैसा स्वीकार करें; इससे इश्क का भाव कल्पना से निकलकर शुद्ध प्रेम बनता है।ध्यान और भक्ति अभ्यास: नियमित ध्यान, ज्ञान-चिंतन, अनुष्ठान और भक्ति कलाओं से इश्क को ईश्वरीय प्रेम में रूपांतरित करें, जो आनंद और एकत्व की अनुभूति देता है।सतगुरु की शरण लें: जागृत गुरु के सान्निध्य में इश्क को आध्यात्मिक प्रेम की चाबी बनाएं, जो मोह-माया से ऊपर उठाकर परमात्मा तक पहुंचाता है।करुणा-कृतज्ञता बढ़ाएं: रोज अलौकिक भाव जैसे आशा, दया और कृतज्ञता को अपनाकर इश्क को उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलें।सत्संग और नैतिक जीवन: सत्संग सुनें, अनुशासन पालन करें तथा प्रेम को समर्पण भाव से जोड़ें, जिससे इश्क आध्यात्मिक मार्ग का आधार बने।यह परिवर्तन धीरे-धीरे साधना से होता है, जहां इश्क मोक्ष का द्वार खोलता है।अध्यात्म में जब कहा जाता है कि “मन को इश्क मारता है,” तो यह भाव उस गहरे प्रेम या आकर्षण की ओर इशारा करता है जो मन को परमात्मा या दिव्य तत्व के प्रति लगाव के रूप में प्रभावित करता है। यह प्रेम साधक के लिए एक गहन आध्यात्मिक अनुभव होता है, जो मन को संसारिक सोच से हटाकर ईश्वरीय प्रेम में डुबो देता है। अध्यात्म में यह प्रेम मानसिक विकार नहीं, बल्कि परमात्मा से प्रेम की दिव्य ऊर्जा के रूप में समझा जाता है, जो साधना के माध्यम से प्रकट होता है और मन को सजग करता है।मन में यह इश्क जब घटित होता है तो साधक अनुभव करता है कि वह प्रेम में डूबा हुआ है, जिसमें भावुकता, संवेदनशीलता, और गुरु-ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना प्रबल होती है। इस अनुभव में प्रेम को धोखा नहीं माना जाता, बल्कि यह प्रेम की ऊर्जा है जो साधक को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। जब ध्यान और साधना पक जाती है तो यह प्रेम परमात्मा के साथ एकत्व की अनुभूति बन जाती है।इस विषय पर यह भी उल्लेखनीय है कि अध्यात्म में प्रेम एक क्रांतिकारी शक्ति है जो मन को परिवर्तनशील बनाती है और साधक को मोह-माया से ऊपर उठने में मदद करती है। प्रेम का यह इश्क साधना के साथ जुड़ा होता है और उसे स्थिर बनाए रखता है। अध्यात्मिक प्रेम केवल मानसिक या भावनात्मक स्थिति नहीं, बल्कि एक दिव्य उल्लास और शांति का स्रोत है।इसलिए, अध्यात्म में मन को जो इश्क मारता है वह संसारिक प्रेम से भिन्न एक आध्यात्मिक अनुभव है, जो साधक के मन और आत्मा को परमात्मा के अनंत प्रेम में बंध देता है और मोक्ष की ओर ले जाता है Read More
November 27, 2025 भौतिक दुनिया के कर्म करते हुए अपने को अध्यात्म में लय रखना मतलब बिना स्वार्थ के, पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कर्म करना और ईश्वर को जानने का प्रयास करना है। ऐसा करने के लिए कर्म योग का मार्ग सबसे उपयुक्त माना जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने कार्यों को ईश्वर को समर्पित कर देता है और कर्मों के फलों की इच्छा छोड़ देता है। इस प्रकार, भौतिक कर्म करते हुए भी व्यक्ति अपनी आंतरिक चेतना को धर्म, नैतिकता और अध्यात्म के साथ जोड़े रखता है।आध्यात्म में लय बनाए रखने के लिए जरूरी है:कर्मों में लोभ, अहंकार और स्वार्थ न हो।कर्म को ईश्वर की शक्ति से प्रेरित होकर निष्काम भाव से किया जाए।सभी जीवों और प्रकृति के साथ एक समान जुड़ाव और प्रेम भाव बनाए रखा जाए।अपने शरीर, मन और भावनाओं को नियंत्रित करके उन्हें ईश्वर की ओर प्रबल किया जाए।ईश्वर को जानने और पाने के लिए स्वाभाविक अनुभव और बोध आवश्यक है, जो मन, बुद्धि, और अनुभूति के स्तर पर गहराई से होता है। इससे व्यक्ति अपने अंदर से ब्रह्मांडीय ऊर्जा में समाहित होकर अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को पहचानता है। गुरु की दी हुई साधना, सत्संग, और ध्यान भी इस मार्ग को सशक्त करते हैं। बिना स्वार्थ के भक्ति, ज्ञान, और कर्म योग का अनुकरण करके भौतिक जीवन में भी अध्यात्म की उपस्थिति बनी रहती है। भौतिक कर्म करते हुए अपने को अध्यात्म में लय में रखना एक संतुलन है जहाँ कर्म करते समय व्यक्ति अपने मन को ईश्वर से जोड़े रखता है, स्वार्थ त्यागता है, और कर्म के फलों की इच्छा मुक्त होकर जीवन के हर पहलू में ईश्वर के दर्शन और अनुभूति को प्राप्त करता है। यह मार्ग कर्म योग, भक्ति योग, और ज्ञान योग का एक संगम है जो जीवन को पूर्ण आध्यात्मिक बनाता है Read More
November 26, 2025 चश्म बंदों गोशबन्दों लब बंदोगर न बिनी सिर्रेबर मन बखंदयह पंक्ति दरअसल कबीर या किसी सूफ़ी/भक्ति संत की रचना हो सकती है जिसमें मन और इंद्रिय (आंख, कान, होंठ आदि) को बंद करने का अर्थ आंतरिक शांति और एकाग्रता से जोड़ा गया है।”चश्म बंदों” का मतलब है आंखें बंद करना, “गोशबन्दों” का मतलब है कान बंद करना, “लब बन्धों” का मतलब है जबड़े या होंठ बंद करना, और “गर न बिनी सिर्रेबर मन बखंद” का अभिप्राय है कि सिर (शरीर) का ध्यान मन से न बँधा हो। यानि भौतिक इंद्रियों को बंद कर भी अगर मन शांत और एकाग्र नहीं है, तो साधना पूरी नहीं होती।इसका सादृश्य यह है कि सिर्फ बाहरी इंद्रियों को बंद कर लेना पर्याप्त नहीं है, मन का नियंत्रण और उसके स्थिर होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। मन बँधना यानी मन का नियंत्रण और उसकी एकाग्रता, जो भीतर की शांति से जुड़ी हो, वह योग और ध्यान की मूलभूत आवश्यकता है।यह पंक्ति साधना के इस महत्वपूर्ण बिन्दु पर प्रकाश डालती है कि केवल बाहरी इंद्रियों को संयमित कर लेना या बंद कर लेना ही नहीं, बल्कि मन को भी उसी तरह संयमित करना और केन्द्रित करना आवश्यक है ताकि वास्तव में आंतरिक शांति और ध्यान की प्राप्ति हो सके। यह आध्यात्मिक अभ्यास में जरूरी है।अत: यह वाक्यांश गुरु और योग की दृष्टि से बताता है कि मन का बँधना (एकाग्र होना) इंद्रिय संयम से भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, बिना मन के बँधे साधना अधूरी रहती है। यह कई तत्वज्ञ संतों और कवियों के अनुसार योग और भक्ति में महत्वपूर्ण तत्व है Read More