पतंजलि योगसूत्र योग दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसे महर्षि पतंजलि ने रचा है। इसमें योग को आत्मज्ञान और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग...
मनुष्य में मुख्य रूप से छह प्रकार के विकार माने गए हैं, जिन्हें षड् विकार या षड् रिपु (छह शत्रु) कहा जाता है। ये...
ध्यान द्वारा मन को माया और संसारिक भोगों से हटाकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर मोड़ा जा सकता है। नश्वर (अस्थायी) और शाश्वत...
आत्मा शुद्ध, शाश्वत, और अमर है। इसका स्वभाव सत्य (सत), चेतना (चित), और आनंद (आनंद) है। यह माया से परे और सभी बंधनों से...
मन और आत्मा के बीच का अंतर समझना आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मन माया में लिप्त होता है, क्योंकि यह संसारिक...
वैराग्य और मोक्ष का साधन: शरीर की अस्थिरता, जरा (बुढ़ापा), रोग, और मृत्यु को देखकर साधक में वैराग्य उत्पन्न होता है। यह वैराग्य उसे...
भगवद गीता: भगवान कृष्ण ने कहा है, “अशरीरं शरीरेषु” – आत्मा शरीर में रहते हुए भी उससे परे है। कठोपनिषद: “अणोरणीयान् महतो महीयान्” –...
स्थूल शरीर (भौतिक शरीर) वह शरीर है जो हमें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है और जिसके माध्यम से हम इस भौतिक संसार का...
भगवद गीता: “वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्” – आत्मा अविनाशी, नित्य, अजन्मा, और अपरिवर्तनीय है। उपनिषद: “अहं ब्रह्मास्मि” – आत्मा ही ब्रह्म (परमात्मा) है। बृहदारण्यक...