।अगर निकले जनाज़ा मेरा तेरे दर के पास से,
तो ऐ दोस्त… एक फूल मेरी अर्थी पर फेंक देना।
बस उसी पल ठहर जायगी मेरी रूह, ओर सोच में रूह पड़ जाएगी किसी ने मुझे जान लिया कि ये ही वो फकीर है जो इसी रास्ते से गुजरता है और आंखे नीचे किये चला जाता है आज उसकी रूह ने पहचान लिया — जाने वाला जो है वहः वही है जो फकीरी में मस्त रहा ओर आज जब जनाजे पर सवार होकर अपनी ही अर्थी पर जा रहा है जहाँ से कभीलौट के नही आता नही अपना पता बताता की फिर कब मिलेंगे क्या ख़ासियत थी उसमे जो दिल मे जगह बना गया खुद फकीरी में रहा ओरो को बादशाह बना गया उसने अपने जीवन मे कभी किसी से न कुछ चाहा न किसी से शिकवा किया।अपने हाल में जीता रहा जो मिला उसी में गुजारा किया समाज में रह पर समाज का हिस्सा भी न बन सका क्योकि समाज ने ही उसे दुत्कार फकीरी का रंग चढ़ा दिया
भीड़ में था, पर भीड़ का हिस्सा न बन सका,
इसलिए शायद किसी ने मुझे अपना कबूल न किया
पर एक फूल जो तूने डाला मेरी अर्थी पर उससे मुझे तेरी पहचान मिल जाएगी,
मेरी खामोश इबादत को ज़ुबान मिल जाएगी।
जनाज़ा तो यूँ ही गुजर जाएगा राहों से,
पर तेरी याद से मेरी रूह मुस्कुरा जाएगी…नमन

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