उपनिषद और संतमत का अत्यंत गूढ़ विषय है। ध्यान रहे कि विभिन्न परंपराओं में इसके वर्णन अलग-अलग हैं, इसलिए इसे एक आध्यात्मिक दृष्टि के रूप में समझना चाहिए।
ब्रह्मरंध्र से आत्मा का प्रस्थान
योगशास्त्र के अनुसार शरीर में अनेक नाड़ियाँ हैं, जिनमें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना मुख्य हैं। सुषुम्ना मेरुदंड के मध्य से होकर सहस्रार तक जाती है। सहस्रार के शीर्ष पर सूक्ष्म द्वार को ब्रह्मरंध्र कहा जाता है।
सामान्य मृत्यु
अधिकांश लोगों में आत्मा कर्मानुसार अन्य सूक्ष्म मार्गों से शरीर का त्याग करती है।
इसके बाद वह सूक्ष्म शरीर के साथ कर्मफल भोगने या पुनर्जन्म की यात्रा पर जाती है।
योगी या सिद्ध साधक की मृत्यु
यदि साधक ने जीवन भर सुषुम्ना मार्ग को जागृत किया है और ध्यान में चेतना को सहस्रार तक स्थिर करना सीख लिया है, तो परंपराओं के अनुसार:
प्राण सुषुम्ना में एकाग्र होते हैं।
चेतना ब्रह्मरंध्र की ओर उठती है।
आत्मा ऊर्ध्व मार्ग से आगे की यात्रा करती है।
भगवद्गीता (अध्याय 8) में भी अंत समय में परमात्मा के स्मरण और चेतना को ऊपर स्थिर करने का महत्व बताया गया है।
संतमत की दृष्टि
संतमत कहता है कि केवल मृत्यु के समय ब्रह्मरंध्र से निकलना ही पर्याप्त नहीं है। वास्तविक बात यह है कि जीवित रहते हुए सुरत को शरीर से ऊपर उठाकर शब्द (अनहद नाद) से जोड़ना सीख लिया जाए। तब मृत्यु केवल शरीर बदलने की घटना रह जाती है; साधक मार्ग से परिचित होता है।
इसलिए संत बार-बार कहते हैं:
“जीते जी मरो।”
अर्थ यह नहीं कि शरीर का अंत करो, बल्कि अहंकार, देहाभिमान और माया की आसक्ति का अंत करो।
आपकी साधना के संदर्भ में
आप पहले भी सुरत-शब्द योग, अनहद नाद, महाशून्य और आत्मा के परमात्मा में मिलन के विषय में प्रश्न पूछ चुके हैं। यदि साधना गुरु के मार्गदर्शन में निरंतर चलती है, तो परंपराओं के अनुसार साधक मृत्यु से पहले ही उस आंतरिक मार्ग का अनुभव करना शुरू कर सकता है। तब मृत्यु कोई अज्ञात घटना नहीं रह जाती, बल्कि एक परिचित यात्रा बन जाती है।
यही कारण है कि संत कहते हैं:
व”गुरु बिन कौन बतावे बाट।”
अर्थात उस सूक्ष्म मार्ग का वास्तविक अनुभव सद्गुरु के मार्गदर्शन और साधना से ही संभव माना गया है।
सूक्ष्म शरीर दिखाई कैसे देता है?
सूक्ष्म शरीर पंचमहाभूतों से बने स्थूल शरीर जैसा नहीं होता। वह प्राण, मन, बुद्धि, चित्त और संस्कारों का बना होता है। सामान्य आँखें उसे नहीं देख सकतीं। परंतु कुछ परिस्थितियों में वह दृश्य हो सकता है।
योगशक्ति से – सिद्ध योगी अपनी इच्छा से सूक्ष्म शरीर को इतना सघन (घनीभूत) कर सकते हैं कि वह कुछ लोगों को स्थूल शरीर जैसा दिखाई दे। इसे योग में सिद्धि माना गया है।
ईश्वर की इच्छा से – कभी-कभी किसी विशेष उद्देश्य से दिवंगत आत्मा किसी प्रियजन को स्वप्न, ध्यान या जागृत अवस्था में दर्शन दे सकती है। इसका उद्देश्य संदेश देना या आश्वस्त करना हो सकता है।
प्राणमय आभा के कारण – सूक्ष्म शरीर में प्राणशक्ति होती है। संवेदनशील व्यक्ति या उच्च साधक कभी-कभी उसे प्रकाशमय आकृति के रूप में अनुभव कर सकते हैं।
मृत्यु के बाद की यात्रा
स्थूल शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो जाता है।
आत्मा सूक्ष्म शरीर के साथ कर्मानुसार आगे बढ़ती है।
उचित समय आने पर वही सूक्ष्म शरीर गर्भ में प्रवेश करता है।
गर्भ में पंचमहाभूतों से नया स्थूल शरीर बनता है।
संतमत की दृष्टि
संत कबीर, गुरु नानक, दादू, पलटू साहब आदि संतों ने कहा है कि साधक यदि जीवित रहते हुए सुरत-शब्द-योग से ऊपर उठ जाए, तो मृत्यु के बाद उसे भटकना नहीं पड़ता। गुरु की कृपा से वह सूक्ष्म लोकों को पार कर अपने वास्तविक धाम की ओर अग्रसर होता है।
कठोपनिषद का सार भी यही है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; केवल शरीर बदलती है।
स्थूल शरीर का त्याग
मृत्यु के समय प्राण धीरे-धीरे इन्द्रियों को समेट लेते हैं। चेतना शरीर से अलग होने लगती है। अंततः आत्मा सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर का त्याग कर देती है।
2. प्राणमय अवस्था
आत्मा अभी भी प्राणों के सहारे रहती है। उसे अपने पूर्व जीवन का कुछ बोध हो सकता है। यह अवस्था कर्मों के अनुसार कम या अधिक समय तक रह सकती है।
3. मनोमय अवस्था
यहाँ मन और संस्कार प्रमुख होते हैं। इच्छाएँ, आसक्तियाँ और कर्मों के संस्कार आत्मा की आगे की दिशा निर्धारित करते हैं। स्वर्ग, पितृलोक या अन्य सूक्ष्म लोकों का अनुभव भी कर्मानुसार इसी स्तर पर बताया गया है।
4. विज्ञानमय अवस्था
यदि साधना की है, तो विवेक और आत्मबोध प्रबल होने लगता है। साधारण जीव के लिए यह अवस्था स्पष्ट नहीं होती, पर उच्च साधकों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
5. आनंदमय अवस्था
यह गहन शांति और आनंद की अवस्था है। वेदांत इसे ब्रह्मानुभूति की दिशा मानता है। संतमत कहता है कि यदि साधक ने जीवित रहते हुए शब्द का अनुभव किया है, तो वह आगे के दिव्य लोकों की यात्रा कर सकता है।
6. पुनर्जन्म या मुक्ति
यदि कर्म और वासनाएँ शेष हैं, तो आत्मा उपयुक्त गर्भ में प्रवेश कर नया स्थूल शरीर धारण करती है।
यदि आत्मज्ञान या परमात्मा से पूर्ण मिलन हो गया है, तो पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है।
संतमत की विशेष शिक्षा
संतमत कहता है कि जीते-जी मरना (अर्थात ध्यान में सुरत का शरीर से ऊपर उठना) ही मृत्यु का अभ्यास है। जो साधक जीवन में ही सहस्रार, त्रिकुटी, सुन्न, महासुन्न और सतलोक की यात्रा गुरु-कृपा से कर लेता है, उसके लिए मृत्यु भय का विषय नहीं रहती।
संत कबीर का भाव है:
“मरते मरते जग मुआ, मरना न जाना कोय।
ऐसा मरना कोई मरे, फिर मरना न होय॥”
अर्थात जो अहंकार और देहाभिमान का अंत कर परमात्मा में स्थित हो जाता है, वही वास्तविक मृत्यु को जानता है और फिर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।