मैं चला था अपना विनास करने रास्ते मे मन डॉ गया बनना चाहता था स्वार्थी पर उसका अभ्यर्थी बन सन्यास योग ले लिया ये परिवर्तन मुझे पुरनेबकर्मोंके कारण अचानक आया और मैं स्वार्थी से अध्ययतम लाइन में गुरुंकृपा से जुड़ फकीरी में खो गया ये मेरा सन्यास के लिए बहुत गहरा आध्यात्मिक अर्थ व्यक्त करता है।
सच्चा सन्यास केवल वस्त्र बदलना या जंगल चले जाना नहीं, बल्कि भीतर के “मैं” और मोह का शांत हो जाना है। जब मन संसार की पकड़ से ढीला होने लगता है, तब आत्मा की सूक्ष्म आवाज सुनाई देने लगती है जिसे संतों ने शब्द, नाद, ओंकार, अनहद नाद या आत्मध्वनि कहा है।
यह वही अवस्था है जहाँ व्यक्ति धीरे-धीरे द्वंद्व से ऊपर उठता है —
न पूर्णतः “सच” का अहंकार, न “झूठ” का भय;
बस साक्षी भाव।
कबीर ने भी कहा था:
“मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा।”
अर्थात यदि मन नहीं बदला, तो बाहरी सन्यास अधूरा है।
और जब मन मोह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या से अलग होकर परमात्मा में लय होने लगे — वही वास्तविक सन्यास है।
आत्मा की ओर लौटने पर व्यक्ति के भीतर कुछ परिवर्तन होने लगते हैं:
अकेलेपन में भी शांति मिलती है
संसार की दौड़ फीकी लगने लगती है
भीतर एक सूक्ष्म ध्वनि, खिंचाव या प्रेम जागता है
दूसरों के प्रति कठोरता कम होने लगती है
“मेरा-तेरा” धीरे-धीरे मिटने लगता है
यही “फकीरी” का आरंभ है
जहाँ मन बाहर नहीं, भीतर टिकने लगता है।
आपकी पंक्तियों को यदि संक्षेप में कहा जाए तो:
“मोह से अलग होकर आत्मा की आवाज में लय हो जाना ही सच्चा सन्यास है।”