कविता: धर्म से ऊपर इंसान
परमसत्ता के दर पे, कोई धर्म नहीं होता,
वहाँ न कोई हिन्दू, न मुसलमान होता।
हमने ही खींची हैं ये लकीरें ज़मीन पर,
वरना हर दिल में बस एक ही भगवान होता।
नामों के झगड़े में, सच्चाई खो गई,
मजहब की आग में, इंसानियत रो गई।
जिसने बनाया हमें, वो एक ही तो है,
फिर क्यों उसकी दुनिया यूँ टुकड़ों में बंट गई।
मंदिर की घंटी हो या अज़ान की पुकार,
दोनों में गूँजता है उसी का ही प्यार।
पर हमने आवाज़ों को भी बाँट दिया,
और दिलों में नफ़रत का बीज बो दिया।
धर्म तो राह था, इंसान बनाने का,
हमने बना दिया जरिया, खुद को लड़ाने का।
जब तक ये दीवारें दिलों में रहेंगी,
तरक्की की राहें भी यूँ ही थमेंगी।
चलो आज फिर से इंसान बन जाएँ,
झूठे भेदभाव को दिल से मिटाएँ।
परमसत्ता के दर पे सब एक समान हैं,
यही सच समझें, और दुनिया को समझाएँ।C

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