January 7, 2026 कृष्ण की बाँसुरी क्यों मन को छूती है? अद्वैत रहस्य कृष्ण की बाँसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि अद्वैत-रहस्य का जीवित प्रतीक है। उसके स्वर में जो आकर्षण है, वह किसी संगीत-कला का नहीं,... Read More
January 7, 2026 अनाहद नाद आध्यात्मिक परंपराओं में वह दिव्य ध्वनि है जो बिना किसी बाहरी टकराव या बाजे के शरीर के अंदर गूंजती है, इसे आत्मा का संगीत या ब्रह्मांड की मूल ध्वनि माना जाता है। यह ध्यान की गहन अवस्था में अनुभव होती है और साधक को परमात्मा से जोड़ती है, मन की शुद्धि और एकाग्रता प्रदान करती है। संत कबीर, गुरु नानक जैसे भक्तों ने इसे आत्मज्ञान का द्वार कहा है।अनाहद नाद का मूल अर्थअनाहद शब्द संस्कृत से आया है, जहां ‘अनाहद’ का अर्थ है बिना घात या टकराहट के, और ‘नाद’ ध्वनि। यह वह सूक्ष्म स्वर है जो शून्य अवस्था से उत्पन्न होता है, जैसे घंटी, शंख, बांसुरी या गरज की आवाजें, जो साधना से क्रमशः प्रकट होती हैं । योग शास्त्रों में इसे नादानुसंधान कहा गया, जो मन को लयबद्ध कर जीवात्मा को परमात्मा से एकाकार करता है ।आध्यात्मिक महत्वसंतमत में अनाहद नाद आत्मा का बाजा है, जो कुंडलिनी जागरण और सहज समाधि का संकेत है, सृष्टि के सृजन-क्षय का प्रतीक। इसे सुनने से नाड़ी तंत्र शुद्ध होता है, विचार पवित्र और आनंद प्राप्ति होती है, ईश्वर की निकटता अनुभव होती है । यह बिना गुरु कृपा के नहीं जाना जाता, और इसे आत्मा में बसा लेना संतत्व की निशानी है ।साधना में भूमिकागहन ध्यान, नाम जप और श्वास नियंत्रण से दाहिने कान से इसे सुना जाता है, जो सुरत को ऊर्ध्व ले जाता है। दस प्रकार की ध्वनियां (चिनचिन से गरज तक) क्रम से अनुभव होती हैं, जो ब्रह्म पथ की यात्रा दर्शाती हैं । वासनाओं के बिना ही इसका सच्चा अनुभव संभव है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता हैअनाहद नाद को आध्यात्मिक परंपराओं में आत्मा का बाजा या दिव्य संगीत कहा जाता है, जो बिना किसी बाहरी टकराहट के शरीर के भीतर स्वतः गूंजता है। इसे जान लेने और आत्मा में स्थापित कर लेने वाला साधक ही सच्चा संत बनता है, क्योंकि यह परमात्मा से एकाकार होने का प्रतीक है।अनाहद नाद का अर्थअनाहद नाद वह सूक्ष्म ध्वनि है जो ध्यान की गहन अवस्था में सुनाई देती है, जैसे घंटी, बांसुरी या ओमकार की गूंज। कबीर और नानक जैसे संतों ने इसे आत्मा का संगीत माना है, जो अहंकार नष्ट कर शांति प्रदान करता है । यह बिना बजाए बजने वाली ध्वनि है, जो साधना से आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है।संतमत में महत्वसंत परंपरा में अनाहद नाद को... Read More
January 6, 2026 आध्यात्मिक यात्रा में सफलता बाहरी दुनिया के साधनों—जैसे धन, पद-प्रतिष्ठा या भौतिक सुखों—से नहीं, बल्कि मन के साधन से प्राप्त होती है। मन ही वह पुल है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है।भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: “बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः” (गीता ६.६)—अर्थात्, जिसने अपने मन को जीत लिया, उसके लिए मन ही मित्र है। बाहर की दुनिया तो माया का जाल है, लेकिन मन को शुद्ध, एकाग्र और वैराग्यपूर्ण बनाकर ही साधना सिद्ध होती है। उपनिषदों में भी कहा गया है कि “मन एव सर्वं विश्वं”—मन ही संपूर्ण ब्रह्मांड है। साधक को मन की शुद्धि के लिए ध्यान, जप और स्वाध्याय ही मुख्य साधन हैं।सूफी संतों की परंपरा में भी यही भाव है। रूमी कहते हैं, “मन को बाहर की चमक से हटाकर भीतर की रोशनी की ओर मोड़ो।” आध्यात्मिक सफर में मन का संयम ही असली कुंजी है—यह न तो किसी गुरु के बिना संभव है, न ही बिना आत्म-चिंतन के।क्या आप इस पर कोई विशेष श्लोक या सूफी दोहा उदाहरण चाहेंगे, या अपनी यात्रा के अनुभव साझा करना चाहते हैं? Read More
January 6, 2026 ध्यात्म में प्रेम सर्वोच्च स्थान रखता है, और इसके नीचे भक्ति, ज्ञान, ध्यान तथा भजन आते हैं। प्रेम ही भक्ति का मूल आधार है, जो हृदय को परमात्मा से जोड़ता है। बिना प्रेम के न ज्ञान संभव है, न सच्ची भक्ति।प्रेम की प्रधानताप्रेम अध्यात्म का प्रथम सोपान है, जो अहंकार को भंग कर आत्मा को जागृत करता है। यह द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है, जहाँ जीव अपने समर्पण से परम सत्य में विलीन हो जाता है। भक्ति प्रेम का ही रूप है, जिसमें भजन-कीर्तन जैसी विधियाँ सहायक होती हैं।भक्ति-ज्ञान का संबंधभक्ति प्रेम से प्रारंभ होकर ज्ञान की ओर अग्रसर होती है, किंतु ज्ञान बिना प्रेम के शुष्क रहता है। ध्यान ज्ञान का फल है, जो अंतर्मुख जिज्ञासा से उत्पन्न होता है। भजन भक्ति की साधना है, जो प्रेम को गहन बनाती है।साधना क्रमप्रेम: आधार, समर्पण का प्रारंभ।भक्ति: प्रेम की अभिव्यक्ति, भजन-कीर्तन से।ज्ञान: जिज्ञासा से, द्वैत का अतिक्रमण।ध्यान: एकाग्रता, आत्म-साक्षात्कार Read More
January 5, 2026 शून्य से अनंत तक: अनाहद नाद द्वारा आत्मा की दिव्य या पिताजी साहब का अध्यात्म में जब भी ध्यान या पूजा करवाते थे शुरू शुरू में शिष्य को कोई भी धार्मिक पूजा करने को।कहते उससे... Read More
January 2, 2026 सूफी साधना में बका: अहंकार से परे शाश्वत चेतना की यात्रा बका सूफी दर्शन में फना के बाद की परम अवस्था है, जहाँ अनुभव शाश्वत एकता और दिव्य गुणों से भरपूर होते हैं।अनुभवों के चरित्रशाश्वत... Read More