mera ये कथन एक गहरी सोच की ओर संकेत करता है।
अनेक संत परंपराओं में कहा गया है कि जब “मैं” (अहंकार), वासनाएँ, और मन के विकार धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं, तब साधक के भीतर गुरु-कृपा को ग्रहण करने की पात्रता बढ़ती है। गुरु की कृपा तो सदैव विद्यमान मानी जाती है, पर उसे अनुभव करने में अहंकार और विकार ही सबसे बड़ा आवरण बनते हैं।
सिख, संत और योग परंपराओं में दशम द्वार (दसम द्वार) को सामान्य इंद्रिय-बोध से परे चेतना के उच्च अनुभव का प्रतीक माना गया है। यह कोई साधारण भौतिक द्वार नहीं, बल्कि चेतना की ऐसी अवस्था है जहाँ मन की चंचलता शांत होने लगती है और साधक भीतर की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करता है।
इस दृष्टि से कहा जा सकता है:
जब “मैं” मिटने लगता है, तब “तू” प्रकट होने लगता है।
जब अहंकार झुकता है, तब गुरु-कृपा का अनुभव गहरा होता है।
और जब मन के विकार शांत होते हैं, तब चेतना के उच्च द्वार खुलने लगते हैं।
हालाँकि अधिकांश परंपराएँ यह भी कहती हैं कि केवल विकारों का समाप्त होना ही पर्याप्त नहीं है; गुरु का मार्गदर्शन, साधना, विवेक, समर्पण और ईश्वर-कृपा—ये सब मिलकर साधक को आगे ले जाते हैं।
कबीर ने भी इसी भाव को व्यक्त किया है:
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥”
अर्थात जहाँ अहंकार का “मैं” घटता है, वहीं दिव्य अनुभव के द्वार खुलते हैं।