ना मुझे ताज की ख्वाहिश,
ना मुझे शोहरत का नशा,
तेरे कदमों में जो गुज़र जाए,
वही है मेरा असली नशा।
ना ऊँचाइयों का लालच है,
ना दुनिया में पहचान की प्यास,
तेरे दर पे जो मिट जाऊँ,
वही है मेरी हर एक आस।
फकीरी की यही शान है,
कि “मैं” कहीं बाकी न रहे,
बस तू ही तू रह जाए भीतर,
और दिल भी तेरे नाम रहे।