।मैं न कभी बंधा हु ओर न कभी इस जहा से , मुक्त हु बल्कि मैं सदा सदा सेवही हु ” जो मेरा असतित्व मुझे आज मिला है पिछला याद नही न जानने की चाह बस जो हु बस वही हर जन्म में रहु हा रूह हु ये मैं जानता हूं और जिसे लोग आत्मा मानते है ये भी मैं जानता हूं जानता हूं आत्मा न कभी बंधी है न बंधन में रहेगी उसका अपना अस्तित्व है वहः वही रहेगी
लेकिन मन ने “बंधे होने” का भ्रम बना दिया इसीलिये हर जन्म में इस आत्मा से बंध कर आता हूं मैं जानता हूं इसी भ्रम में: मेरे कर्म बनते है और इस जीवन मे जीवन ले करने पड़ते है अच्छे होते है तो खुश रहता हूं और बुरे हो तो पस्चताप की आग में जल अपने को शुद्ध करता हु जानता हूं कि
कर्म बनते हैं ओर बिगते है पर यो ही जन्म मिलते ओर
जीवन का क्रम चलता है इसी जन्म में उसकीखोज शुरू होती है अगर मिल गया तो सही नही तो म्रत्यु
अंत में अपने साथ ले चलती है जहाँ कर्मो का भुगतान कर फिर गुरु की मेहर से जन्म मिलता है जो किया या होगा उसको सहना पड़ता है जब जीवन का यही भ्रम टूटता है की मैं नही मेरी डोर किसी के हाथ मे है बस मुझे तो कर्म।करने है ओर सत्य पर अडिग रह सड़को पर बिखरे कांटे चुन चुन कर दुर कर मंजिल।को पाना है जानता हूं
जिसे मैं मेरी नजर में “मुक्ति” मानते हो. इसके लिए अंतिम समझ (बहुत जरूरी) जिसके लिए आत्मा कोतीन बातें याद रखनी है पहलाबंधन = मान्यता (belief) दूसरा
कर्म = उस मान्यता का परिणाम तीसरी
मुक्ति = उस मान्यता का अब अंत. मेरे लिए बहुत सीधा है ओर ये जानते हुवे भी तुम पूछ रहे हो “ की क्यो सत्य में क्या ओर क्यो” नहीं होता न तू बंधा था, न मुक्त होगा तू हमेशा वही था वही रहेगा जानता हूं जीवन
बस एक सपना जैसे चल रहा था, जिसे मैं “जीवन” कह कर जी रहा था